_ एक समय था जब मैं हर छोटी-बड़ी बात पर खुद से शिकायत करता था.
– क्यों ऐसा हुआ ?
– मैंने ऐसा फैसला क्यों लिया ?
– मैं दूसरों जैसा क्यों नहीं हूँ ?
– मेरी जिंदगी मेरी उम्मीदों के मुताबिक क्यों नहीं चल रही ?
_ इन सवालों ने मुझे कभी आगे बढ़ने नहीं दिया.
_ मैं हर असफलता का दोष खुद को देता रहा.
_ जो बातें मेरे नियंत्रण में नहीं थीं, उनके लिए भी खुद को कटघरे में खड़ा करता रहा.
_ लेकिन समय ने एक बात सिखाई—हर चीज़ का जवाब हमारे पास नहीं होता.
_ हर हार हमारी गलती नहीं होती और हर जीत सिर्फ हमारी मेहनत का परिणाम नहीं होती.
_ जिंदगी में परिस्थितियाँ, समय और किस्मत भी अपना हिस्सा निभाते हैं.
_ आज मैं अपनी गलतियों को स्वीकार करता हूँ, लेकिन उनके लिए खुद को सज़ा नहीं देता.
_ मैं जानता हूँ कि मैं इंसान हूँ, मुझसे गलतियाँ होंगी, फैसले गलत होंगे और कुछ सपने अधूरे भी रह जाएंगे.
_ लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं खुद का दुश्मन बन जाऊँ.
_ अब मैं शिकायतें खुद से भी नहीं करता.
_ जो बीत गया, उसे अनुभव मान लेता हूँ.
_ जो नहीं मिला, उसे सीख समझ लेता हूँ.
_ और जो मिल गया, उसके लिए आभार व्यक्त करता हूँ.
_ पहले मैं आईने में खड़े होकर अपनी कमियाँ खोजता था, अब अपनी कोशिशें देखता हूँ.
_ पहले मैं अपने जख्म गिनता था, अब उनसे मिली सीख को याद रखता हूँ.
_ जिंदगी तब आसान नहीं हुई, लेकिन उसे देखने का नजरिया बदल गया..
_ और जब नजरिया बदलता है, तो शिकायतें धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं.
_ आज भी मुश्किलें हैं, चुनौतियाँ हैं, अधूरे सपने हैं, लेकिन अब मैं खुद से लड़ता नहीं हूँ. _ क्योंकि समझ आ गया है कि दुनिया से लड़ने के लिए सबसे पहले खुद का साथी बनना पड़ता है.
_ अब मैं शिकायतें खुद से भी नहीं करता,
_ क्योंकि मैंने खुद को स्वीकार करना सीख लिया है.!!