सुविचार – दुख – दुःख – 137

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साइकोलॉजी के अनुसार : आपको दुःख तभी होता है, जब आप किसी व्यक्ति या किसी बात को अपने मन में महत्व देते हैं,

_ अगर आप उस व्यक्ति या उस बात को महत्व देना बंद कर दें, तो दुख भी अपने आप कम हो जाएगा !
_ जब भी आप को दुखी होने का ख्याल आए, ख़ुद से कहें कि इस व्यक्ति या इस बात को महत्व देने से कोई फायदा नहीं है.
_ यही एक मानसिक तरकीब है, जिससे आप चैन से जी सकते हैं,
_ वरना, आप ज़िन्दगी भर किसी न किसी बात को लेकर दुखी होते रहेंगे..!!
खुशियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे हमेशा कभी पूरी नहीं होती और गाहे-बगाहे कम पड़ जाती हैं,

_ जबकि हमारे दुख अपने आपमें – भले एक या बहुत छोटे हो – संपूर्ण होते हैं और इतने भरपूर होते हैं कि वे एक जीवन क्या, समूची कायनात को हिलाकर रख सकते हैं,
_ इसलिए खुशियों को तवज्जों मत दीजिए, दुखों से मनमिली दोस्ती कीजिए, प्यार कीजिए – जीवन खुद-ब-खुद गुलज़ार रहेगा.!!
– Sandip Naik
हम दुखी इसलिए नहीं होते कि जीवन में मुश्किलें आती हैं, बल्कि इसलिए दुखी होते हैं, क्योंकि हमने जीवन से पहले ही बहुत सारी उम्मीदें और कल्पनाएँ जोड़ ली होती हैं.

_ जब जो होता है, वो हमारी बनाई हुई उस तस्वीर से मेल नहीं खाता,
तो मन उसे स्वीकार करने से इनकार कर देता है.
_ और यही इनकार, यही विरोध — असल में दर्द बन जाता है.
_ वही बारिश एक किसान के लिए आशीर्वाद है, क्योंकि उसकी अपेक्षा ठीक वही थी.
_ लेकिन उसी बारिश से शादी वाले घर में लोग परेशान हो जाते हैं, क्योंकि उनकी अपेक्षा कुछ और थी.
_ घटना तो एक ही है — दुख कहीं बाहर नहीं, बल्कि टूटी हुई अपेक्षा के अंदर पैदा होता है.
– राहुल आर्यन
लोगों की नजर में सुख दुख सिर्फ पाने और खोने का नाम है.

_ यानी जो हम चाहें, वह हमें मिल जाए, तो हम सुखी, अन्यथा दुखी. यह सत्य नहीं है.
_ पाने और खोने में सिर्फ तात्कालिक सुख दुख निहित होता है.
_ पाई हुई वस्तु या इंसान को आप ताउम्र पाए रहेंगे, यह आश्वस्ति उस पाने में शामिल नहीं होती.
_ पाई हुई वस्तु ताउम्र आपको खुशी देगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती.
_ पाने के बाद कोई अन्य वस्तु, हालात से आप परेशान हो सकते हैं जिसका पाने खोने से कोई ताल्लुक न हो.
_ सब कुछ पाने-मिलने के बाद भी किसी नापसंदगी के लिए मन परेशान हो जाता है.
_ सिर्फ मिलना या ना मिलना ही सुख या दुख का कारण नहीं होता.
_ बात गहरी है.
– Manika Mohini
पहले दुःख भाँप लिया जाता था. अब दुःख मापा जाता है.
_ उसका दुःख कम मेरा दुःख ज़्यादा.
_ इस आधार पर लोगों ने दुःख सुनना और अपनी संवेदनाएँ देना तय कर लिया है.
_ सच कहूँ तो सुन कोई नहीं रहा होता है और झूठी संवेदनाएँ सबके पास है.
_ असल में दुःख बाँटने की अवधारणा इतनी खोखली है ये कोई जानना ही नहीं चाहता है.

_ अनसुने किए गये दुःख, और झूठी संवेदनाओं के इस दौर से ही दुःख का कारोबार अच्छा चल नहीं रहा.
_ दुःख बेच तो सब रहे हैं, पर दुःख इस बात का भी है कि ख़रीदार यहाँ कोई नहीं.
_ खुश दिखने वाले चेहरों का मोल है यहाँ बेशक़ीमती है.
_ दुःख से भरे चेहरों की क़ीमत कबाड़ी की दुकान में पड़े रद्दी से भी कम है.
_ वास्तविकता यही है, मुँह नहीं मोड़िए.
– यूँ हीं
– पथिक मनीष
अब मैं शिकायतें खुद से भी नहीं करता

_ एक समय था जब मैं हर छोटी-बड़ी बात पर खुद से शिकायत करता था.
– क्यों ऐसा हुआ ?
– मैंने ऐसा फैसला क्यों लिया ?
– मैं दूसरों जैसा क्यों नहीं हूँ ?
– मेरी जिंदगी मेरी उम्मीदों के मुताबिक क्यों नहीं चल रही ?
_ इन सवालों ने मुझे कभी आगे बढ़ने नहीं दिया.
_ मैं हर असफलता का दोष खुद को देता रहा.
_ जो बातें मेरे नियंत्रण में नहीं थीं, उनके लिए भी खुद को कटघरे में खड़ा करता रहा.
_ लेकिन समय ने एक बात सिखाई—हर चीज़ का जवाब हमारे पास नहीं होता.
_ हर हार हमारी गलती नहीं होती और हर जीत सिर्फ हमारी मेहनत का परिणाम नहीं होती.
_ जिंदगी में परिस्थितियाँ, समय और किस्मत भी अपना हिस्सा निभाते हैं.
_ आज मैं अपनी गलतियों को स्वीकार करता हूँ, लेकिन उनके लिए खुद को सज़ा नहीं देता.
_ मैं जानता हूँ कि मैं इंसान हूँ, मुझसे गलतियाँ होंगी, फैसले गलत होंगे और कुछ सपने अधूरे भी रह जाएंगे.
_ लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं खुद का दुश्मन बन जाऊँ.
_ अब मैं शिकायतें खुद से भी नहीं करता.
_ जो बीत गया, उसे अनुभव मान लेता हूँ.
_ जो नहीं मिला, उसे सीख समझ लेता हूँ.
_ और जो मिल गया, उसके लिए आभार व्यक्त करता हूँ.
_ पहले मैं आईने में खड़े होकर अपनी कमियाँ खोजता था, अब अपनी कोशिशें देखता हूँ.
_ पहले मैं अपने जख्म गिनता था, अब उनसे मिली सीख को याद रखता हूँ.
_ जिंदगी तब आसान नहीं हुई, लेकिन उसे देखने का नजरिया बदल गया..
_ और जब नजरिया बदलता है, तो शिकायतें धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं.
_ आज भी मुश्किलें हैं, चुनौतियाँ हैं, अधूरे सपने हैं, लेकिन अब मैं खुद से लड़ता नहीं हूँ. _ क्योंकि समझ आ गया है कि दुनिया से लड़ने के लिए सबसे पहले खुद का साथी बनना पड़ता है.
_ अब मैं शिकायतें खुद से भी नहीं करता,
_ क्योंकि मैंने खुद को स्वीकार करना सीख लिया है.!!
जिंदगी इन दिनों —
– पथिक मनीष
मन परेशान है, न पढ़ पा रहा हूँ, न लिख पा रहा हूँ.

_ किताबें खुली हैं, लेकिन शब्द आँखों से टकराकर लौट जाते हैं.
_ कलम हाथ में है, लेकिन विचार कागज़ तक पहुँचने से पहले ही कहीं खो जाते हैं.
_ अजीब बात है… थकान शरीर में नहीं, मन में है और मन की थकान दिखाई भी नहीं देती.
– लोग पूछते हैं – “क्या हुआ ?”
_ लेकिन क्या बताऊँ ?
_ कभी-कभी कोई एक कारण नहीं होता.
_ कुछ अधूरे सपने, कुछ टूटी उम्मीदें, कुछ भविष्य की चिंताएँ और कुछ बीते दिनों की यादें मिलकर मन पर ऐसा बोझ बना देती हैं कि साधारण काम भी पहाड़ जैसे लगने लगते हैं.
_ आज मैं पढ़ नहीं पा रहा, क्योंकि मन हर पन्ने से पहले अपने सवालों पर अटक जाता है.
_ आज मैं लिख नहीं पा रहा, क्योंकि शब्दों से पहले दर्द बाहर आना चाहता है.
_ लेकिन शायद जीवन का हर अध्याय उत्पादक होने के लिए नहीं होता.
_ कुछ अध्याय ऐसे भी होते हैं जहाँ इंसान सिर्फ़ खुद को संभालना सीखता है.
_ जहाँ जीतने से ज़्यादा ज़रूरी होता है टूटकर बिखरने से बच जाना.
– मैं जानता हूँ, यह दौर भी गुजर जाएगा.
_ एक दिन फिर किताबों के शब्द अच्छे लगेंगे, फिर कलम कहानियाँ लिखेगी, फिर सपनों में चमक होगी.
_ अभी बस इतना है कि मन थोड़ा थका हुआ है और थके हुए मन को डाँट नहीं, थोड़ा समय चाहिए.!!
जिंदगी इन दिनों —
– पथिक मनीष
मुझे लगता हैं कि जीवन को जीने में हम ज़रूर कोई गलती कर रहे हैं…जो यह इतना दुःख दे रहा है..

_ क्योंकि ये सच नहीं हो सकता…इतना दुःख हो ही नहीं सकता.!!
_ शायद जीवन गलती नहीं कर रहा — बस हमें यह दिखा रहा है कि हम अभी अपने सच्चे स्वरूप से कितने दूर हैं.
_ दुःख वहीँ जन्म लेता है.. जहाँ हम वास्तविकता से टकराते हैं.
_ कभी-कभी यह दुःख-पीड़ा, जीवन का सबसे गहरा आमंत्रण होती है — भीतर झाँकने का, यह देखने का कि “मैं कौन हूँ” जब सब कुछ टूट रहा होता है.
_ हो सकता है, दुःख हमें गलत नहीं, बल्कि सही दिशा की ओर मोड़ रहा हो.!!
दुख ही जगाता है, सुख तो सुलाता है.!!
“जीवन में इतना दुःख नहीं हो सकता..
_ शायद गलती जीवन में नहीं, हमारे जीने के तरीके में है.”
_ जीवन को जीने में हम ज़रूर कोई गलती कर रहे हैं.. जो यह इतना दुःख दे रहा है.!
_ क्योंकि ये सच नहीं हो सकता…इतना दुःख हो ही नहीं सकता.!!
कुछ बुरा हो जाए तो यह सोच कर तसल्ली करनी पड़ती है कि इससे भी ज़्यादा बुरा हो सकता था.

_ दुख में सब्र करने का यह अचूक नुस्खा है कि यह सोचिए, इससे बड़ा भी दुख हो सकता था.
_ कुछ बुरा हो जाए तो यह सोच कर तसल्ली कीजिए कि इससे भी ज़्यादा बुरा हो सकता था.
_ दुख सहने की शक्ति मिलेगी.!!
अगर दुख में आप रस लेने लग गए, तब तो आप ने सुख के सब द्वार बन्द कर दिए. _ दुखी रहते- रहते, बहुत दिन तक दुखी रहते- रहते दुख के साथ संग बन गया, संबध बन गए. _ फिर तो अगर कोई आ भी जाए सुख देने, तो भी आप द्वार बन्द कर लेंगे.!!
पेड़ों की तरह हमारे जीवन में भी कई दौर आते हैं..

_ हमारे हिस्से भी पतझड़ आते हैं..
_ कभी हम अनंत दुःख की गहराइयों में डूब जाते हैं, मानसिक अवसाद के घने अंधेरों से घिर जाते हैं, पर समय सदा एक-सा नहीं रहता..
_ जब दौर बदलता है, तो सूखी शाखाओं पर फिर से उम्मीदों की नई कलियाँ फूट पड़ती हैं, और जीवन एक बार फिर हरियाली ओढ़ लेता है.!!
हर व्यक्ति को लगता है कि उसी ने सबसे ज्यादा दुःख झेलें हैं, लेकिन सच तो यह है कि हमसे भी ज्यादा दुःख झेल चुके लोग हिम्मत के साथ लड़ रहे हैं.!!
कभी-कभी जो दरवाज़ा बंद हो होता है, वह हमें दुख से बचाता है.

_ गलत जगह से हटना हार नहीं, अपने सम्मान का चयन है.
_ नियति जब रुख मोड़ती है तो इसलिए कि.. आगे कुछ अधिक उपयुक्त और विशाल आपका इंतज़ार कर रहा है.!!
दुःख के दिनों में जो भी साथ खड़ा रहे, उसका शुक्रिया हमेशा बनता है..

_ खासकर उन लोगों का, जिनके साथ की हमें कोई उम्मीद भी नहीं होती..
_ ऐसे लोग हमारी बोझिल होती ज़िंदगी का भार थोड़ा हल्का कर देते हैं..
_ और यह एहसास दिलाते हैं कि अभी भी मुस्कुराया जा सकता है.!!
ये हिसाब नहीं रखना की कितना पाया कितना गवाया..!

_ बस चाहत इतनी हो कि दुख वहाँ से न मिले.. जहाँ अपना सुख लुटाया..!!
जिदंगी जीना ही है तो क्या सुख क्या दुख..
_ और दिहाड़ी लगानी है तो क्या छांव क्या धूप.!!
“दुख की जड़ कमी नहीं…

_ अधूरी उम्मीदें और लगातार औरों से तुलना है.”
एक दिन हम अपने दुःखो के साथ भी सहज हो जाते हैं,
_ फिर किसी भी तरह का नयापन हमें असहज लगने लगता है.!
दुःख-दर्द मुफ़्त में मिल जाते हैं.. – ख़ुशी लाख खर्च करने पर भी नहीं मिलती.!!
किसी ने दूसरों को कितना दुख दिया है,

_इसका एहसास उसे तब होता है.. जब कोई उसे वैसे ही दुःख देता है.
दूसरों को दुखी करके कोई भी व्यक्ति स्थायी सुख नहीं पा सकता..

_ समय हर चीज़ का हिसाब रखता है
कुछ दुःख अपनों के साथ भी सांझे नहीं किये जा सकते.!
_ इन दुखों के साथ ही जीना होता है.!!
कुछ दुख ऐसे होते हैं जो बताने के लिए नहीं होते.
_ बस जी कर भूल जाने के लिए होते हैं.!!
दुख बता कर नहीं आते..

_ वे किसी भी पल बादलो के बीच से झांक लेते हैं.!!
मानसिक रोगी होते हैं वो लोग..- जो किसी के दुख पे खुश होते हैं.!!
और एक दिन “दुःखों के लिए कान तो रहते हैं, ज़बान नहीं रहती.!!”
किसी दुखी इंसान को तर्क देकर नहीं समझाया जा सकता, यहाँ समानुभूति (empathy) ही काम आएगी.. जैसे भूखे को पहले खाना चाहिए ज्ञान नहीं..!!
अपने दुःख-तकलीफ पर तुरंत एक्शन लें, कोई दूसरा नहीं आयेगा.!!
जब आप दूसरों के लिए अच्छे बन जाते हैं, तो अपने लिए भी आप बेहतर बन जाते हैं.
दुख को सहने के बाद मिला सुख दोगुना आनंद देता है.!!
हम उन लोगों को दुख पहुँचाते हैं.. जिन्हें हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं – और यह सही नहीं है.!!
किसी को बहुत नज़दीक से जान लेना कभी-कभी बहुत दुख देता है.!!
टूटना, गिरना, गिरकर फिर से उठना और आगे बढ़ना, यहीं जिंदगी का सफर है..

_ जो सकारात्मक ऊर्जा फैला रहा हो उसके जीवन में भी कष्ट है, दुःख है और पीड़ा भी है, यहीं वास्तविकता है.!!
हर किसी के पास कोई न कोई
झोला होता है, जिसमें सुख-दुःख भरे होते हैं, पर कहे भी तो किससे..
_ कुछ लोग चुपचाप बिन शिकायत ढोते हैं.
कोई हमारा दुःख सुनने में रूचि नहीं रखता,
_ बल्कि वो तो ये तोलने में व्यस्त रहते हैं कि वो हमसे ज्यादा सुखी तो नहीं हैं.!!
दुखी होने का भेद यही है कि आप के पास यह सोचने के लिए अवकाश हो कि आप सुखी हैं या नहीं.!!
इस जीवन कि पाठ्शाला में हमें यही तो सीखना है कि समय के साथ कदम से कदम मिलाकर कैसे चला जाए, वरना हमेशा किसी न किसी बात को लेकर ऎसे ही दुःखी रहेंगे.
जीवन सतत चलता रहता है और उसे चलते रहना भी चाहिए ;

_ सुख -दुःख, प्रसन्नता -पीड़ा आते -जाते रहते हैं..
_ जब जैसी परिस्थितियां होती हैं.. इंसान उस अनुकूल ख़ुद को ढाल लेता है.
_ जीवन का लचीलापन जीवन को सुगम बनाता है और अकड़ जीवन को कठिनाइयों से भर देती है.!!
कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिनका होना पूरी उम्र भीतर कहीं चुभता रहता है.

_ ऐसे क्षणों में इंसान खुद को भीड़ के बीच भी अकेला, सबसे दूर किसी हाशिए पर खड़ा महसूस करता है.
_ हताशा और निराशा के ये दौर बेहद कठिन होते हैं, लेकिन इन्हीं पलों में खुद को यह याद दिलाते रहना ज़रूरी है कि.. दुःख स्थायी नहीं होता.!!
दुःख मनाने के लिए भी सही समय का इंतजार करना चाहिए, जब जीवन एकांत देने की स्थिति में न हो, तब बेहतर है कि कुछ समय के लिए अपने शौक स्थगित कर दें और अपनी जिम्मेदारियों और व्यस्तताओं का ध्यान रखें.!!
दुःख कभी जिंदगी नहीं खाता, वो बस जिंदगी की रोशनी बुझा देता है.

_ दुःख बाहर से हमारा कुछ नहीं बिगाड़ता, चेहरा वही रहता है, आवाज़ भी वही, लेकिन भीतर जैसे मन की दीवार में रोज़ एक ईंट कम हो रही है.
_ दुःख को सजाकर अच्छा नहीं दिखाया जा सकता, इसे सिर्फ झेला जा सकता है, खामोशी से चुपचाप.!!
दुःख से ज्यादा निजी कुछ भी नहीं होता, ये वो अहसास है जिसे हम लाख बताना चाहें, फिर भी कोई पूरी तरह समझ नहीं पाता..

_ हर इंसान का दुःख उसका अपना होता है कभी यादों से जुड़ा, कभी रिश्तों से, कभी उम्मीदों के टूट जाने से.!!
कभी-कभी अनजाने में ही हम उन लोगों का दिल दुखा देते हैं, जिनके बारे में हमें यह तक एहसास नहीं होता कि हमारी कही हुई बात उन्हें बुरी लग सकती है..
_ हालांकि किसी को ठेस पहुँचाने का इरादा नही होता..
_ बस शब्द अपनी जगह से फिसल जाते हैं और असर वहाँ पड़ जाता है.. जहाँ हमने सोचा भी नहीं होता.!!
समय के साथ दुःख की टीस हल्की पड़ जाती है,

_ मगर वो पल, वो सुख, वो संपूर्णता.. जो कभी हमें मिला था, उसे खो देना…
_ भीतर एक ऐसी खाली जगह बना देता है… जो उम्रभर महसूस होती रहती है.
_ इंसान दर्द तो भूल जाता है, लेकिन वो एहसास और वो यादें हमेशा दिल की गहराइयों में जिंदा रहती हैं.!!
दुःख में जो भी साथ रहे, उनका शुक्रिया हमेशा बनता है..

_ खासकर उन लोगों का.. जिनकी हमें उम्मीद भी नहीं होती..
_ ऐसे लोग आपकी बोझिल ज़िंदगी को थोड़ा हल्का कर देते हैं..
_ और फिर लगता है कि अभी भी जिया जा सकता है,
_ और जिनसे उम्मीद थी, पर वे साथ न रहे.. उनका भी शुक्रिया बनता है..
_ उन्होंने आपको उस झूठी उम्मीद से आज़ाद किया.. जो आप उनसे लगा बैठे थे.!!
अक्सर देखा गया है जब इंसान खुश होता है, सब सही चल रहा होता है.. तब अपना दिमाग कहीं नही भटकाता है, अपने तक ही सीमित रहता है.

_ लेकिन जैसे ही दुख आते हैं उसे बहुत दूर तक का दिखने लग जाता है..
_ दिमाग में बहुत सारे विचार आने लगते हैं.
_ इंसान ज़िन्दगी जीना सीखता दुख से ही है, सुख में तो वो बस ज़िन्दगी काटने लग जाता है.!!
दुःख को जानना और दुःख भरी बातें करना दोनों में बड़ा आयामी अंतर है…

_ दुःख को जानना दुखों को समा लेना उनको स्वीकार कर लेना है पर दुःख पे दुःख भरी बातें करते जाना, एक के बाद एक दुःख को खोद खोदकर निकालना, जहां नहीं है वहां दुख को बना देना, अगला दुख, पिछला दुख, न जाने किनका किनका दुःख जिनसे बात करने वाले का सरोकार नहीं यही दिखाता है कि इंसान दुख को आदत बनाकर उससे रस लेता है…
– दुख का रस…
_ यह रस बड़ा गहरा होता है, जिसके मुंह इसका स्वाद लगा वह छोड़ नहीं पाता,
_ ऐसा नहीं की दुख नहीं, जीवन है तो दुख है, पर दुख का रस स्वयं बनाते हैं चाशनी मिलाकर…
_ सामने वाले का रस लेकर सुना जाना सुनाने वाले का हासिल होता है…
_ पर इससे असली दुख नजरअंदाज नहीं होता, वह तो है ही…वहीं है ठीक वहीं..!!

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