पतझड़ में पेड़ से गिरने वाले पत्तों की तरह न बनें,
_ जिन्हें हवा द्वारा यहाँ से वहाँ दिशाहीन, लछ्यहीन उड़ा दिया जाता है.
हवा ने माफ़ी तो मांगी..
_ लेकिन तब तक सारे पत्ते गिर चुके थे.!!
जिन दरख्तों की जड़ें मज़बूती से धरती यानी अपने मुल्यों से जुड़ी हो वो हवाओ के परवाज़ नहीं होते…
_ ये मज़बूती साख से टूटे पत्तों में कहां.. जो हवा के साथ निकलते हैं, इसलिए उनका अस्तित्व कचरे से ज्यादा नहीं.
_ जो हवा के साथ चलते हैं, वो कभी अपनी पहचान नहीं बना पाते, और हवा के साथ चलना.. ये काम अक्सर कचरे का ही होता है.!!





