‘तुलना’ दुख का कारण है.’
_मैंने हज़ारों, लाखों की सैलरी पाने वाले उन लोगों को तब दुखी होते देखा है,
_जब उन्हें पता चलता है कि उनके साथी की सैलरी उनसे अधिक है.
_पहले जो अपनी सैलरी से खुश थे, दूसरे की अधिक सैलरी के बारे में सुन कर दुखी हो गए. क्यों ? “तुलना”
_मेरे से ज्यादा उसके पास कैसे ? “तुलना” यही है दुख.
— “तुलना मत कीजिए” किसी की अच्छाई से, किसी की सुंदरता से, किसी की तरक्की से..
_ खुशी ढूंढिए, अपने भीतर..
_जो मिला है, पर्याप्त है ..और चाहिए तो और पाने की कोशिश कीजिए..
_ मत रोकिए और पाने की चाहत को..
_लेकिन दूसरे को देख कर दुखी मत होइए..
– आपको जो भी मिला था, आप खुश हुए थे.
_तब आपने दूसरे के विषय में नहीं सोचा था.
_लेकिन जैसे ही दूसरे को भी कुछ मिला, वो खुश हुआ..
_अच्छी बात थी, लेकिन आप दुखी हो गए..
— “संसार दुखी है” अपने दुख से नहीं, दूसरे की खुशी से..
_संसार को खुश होना चाहिए था “अपनी खुशी से”
_ पर ये मन है,, ये स्वीकार नहीं करता किसी और को अधिक मिले.
_तुलना ही दुख है.
_ दुख जीवन का शाप है, खुशियों का ग्रहण है.
_दुख से मुक्त कीजिए खुद को..
_अपनी हथेली को देखिए..
_उनमें उकेरी गई आड़ी-तिरछी रेखाओं को देखिए, अपनी मुट्ठी को देखिए.
_क्या होगा, दूसरे की हथेली की रेखाओं को झांकने से.
_क्या होगा दूसरों की मुट्ठी खोल कर देखने से.
_ उसके पास कम हुआ तो आप खुश होंगे, हमदर्दी भी रखेंगे.
_ लेकिन अधिक हुआ फिर ?
_ फिर आपकी खुशी काफूर हो जाएगी.
_अपनी खुशी को संभालिए..
_ संतोष रखिए या न रखिए, “तुलना मत कीजिए”
_”तुलना दुख का कारण है”
_ अपनी खुशी मत फेंकिए.