सुविचार 3405
किसी भी परिस्थिति को स्वीकार कर के ही उस से निकला जा सकता है, _
_ इसलिए जो भी है उसे स्वीकार कर के बेहतर बनाएँ..
_ इसलिए जो भी है उसे स्वीकार कर के बेहतर बनाएँ..
हमें इन बातों को ऐसे सहन करना चाहिए जैसे किसी उल्टे घड़े पर पानी उँड़ेला जा रहा हो,
वह घड़ा अपने भीतर पानी को बिलकुल नहीं लेता.
हाँ वह ईमानदारी पत्थर की चट्टान की तरह दृढ और अभेद्य होनी चाहिए,
अकेले आपके ईमानदार होने से, घर पास- पड़ौस में, व्यवसाय में और सभी छेत्रों में जहाँ आप प्रवेश करते हैं,
वहीँ, कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य होता है.
_ लेकिन उसके पीछे प्रेरणा और प्रोत्साहन बहुतों की होती है.