सुविचार 2225
…एक माचिस की तिल्ली, एक घी का लोटा…
…लकड़ियों के ढेर पे, कुछ घण्टे में राख…..
…बस इतनी-सी है “आदमी की औकात”
…लकड़ियों के ढेर पे, कुछ घण्टे में राख…..
…बस इतनी-सी है “आदमी की औकात”
समय का चक्र _ जब घूम- घूम कर वापस आता है.
_ इसे बेवजह चक्रव्यूह मत बनाइए..
_ हर आदमी अपने कर्मों की परिधि तय कर रहा है.. उसे और मत उलझाइए..!!