सुविचार 1331
अपने भीतर दुःख को भी बढ़ाया जा सकता है और सुख को भी. फर्क सिर्फ इतना है कि सुख तरंगायित करता हुआ बढ़ता है और दुःख मन को कचोटता हुआ.
_ उतना ही उसका नैतिक स्तर ऊँचा और प्रभावशाली होगा.
_ बल्कि हमेशा उससे आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए..!!
इसलिए जो अच्छा चाहते हैं, उसके बारे में सोचें.