सुविचार 225

हमारी सोच हमारा भविष्य तय करती है, हमारी दुनिया तभी बदलेगी जब हमारी सोच बदलेगी.

 

सुविचार 224

लोग आपके बारे में क्या कहते हैं, यह आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि उनकी बातों को आप किस रूप में लेते हैं.

 

 

सुविचार – सब कुछ बिखर जाने दो मेरा यार – 223

सब कुछ बिखर जाने दो मेरा यार,

_ सारा परिवार, मित्र, रिश्तेदार
_ हाथ की अँगूठी तक भी
_ फिर भी उत्साह मेरा लौट आएगा
_ बुझेगी नहीं मेरी आँच
_ इस बची- खुची रोशनी से भी
_ जला लूँगा ढेर सारे दीपक
_ उपजा लूँगा फिर से
_ सूखी हुई फसल
_ और तुम्हें दिखाऊँगा
_ अपना हँसता हुआ चेहरा फिर से
_ क्योंकि तुम्हारे ही बोये
_ हिम्मत के नये बीजों ने
_ जन्म लिया है दोबारा मुझमें !

सुविचार – 5–5–5 फार्मूला [Formula] – 222

5–5–5 फार्मूला

खुद से पूछो :
क्या ये बात 5 दिन बाद महत्वपूर्ण [important] होगी?
5 महीने बाद ?
5 साल बाद ?
_ अगर जवाब “नहीं” है, तो अभी भी इतना टेंशन [tention] लेने की जरूरत नहीं है.
– जो कुछ भी अभी मुझे डिस्टर्ब [Disturb] कर रहा है क्या वो 5 साल बाद भी मेरा सुकून छीन पाएगा ?
– हर छोटी बात को बड़ा बनाना भी एक आदत है… और उसे छोड़ देना भी.
Decision Making Formula :
किसी भी फैसले [decision] से पहले 5 चीजें लिखो :
Fayda
Nuksaan
Long-term impact
Emotional effect
Kya ye mere values se match karta hai ?
कभी-कभी जो बात 5 साल बाद भी याद रहती है…वो टेंशन [tension] नहीं, अधूरा अनुभव होता है.

_ इसलिए कभी ये भी पूछिए : “क्या मैं इस पल को पूरा जी रहा हूं, या सिर्फ विश्लेषण कर रहा हूं ?
मैं प्रकृति में जा कर विस्तार [Expand] हो रहा हूँ…या समझ से बच कर हल्का हो रहा हूँ ? दोनों अलग चीज़ें हैं.
अगर कल सुबह मेरी आंख न खुले… तो क्या मैं आज का दिन इस तरह जी रहा हूं.. ‘जैसा जीना चाहिए’ ?

सुविचार 221

वर्त्तमान में हम जो कुछ हैं, अपने विचारों के ही कारण हैं और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे, वह भी इन्ही के कारण.

 

सुविचार – सुलझना – 220

सुलझना जटिल प्रक्रिया है, उलझना बड़ा आसान है.

_ सुलझाव के लिए जागृति चाहिए, होश चाहिए, सचेतना चाहिए.
_ इसके विपरीत जरा सी असावधानी हुई कि उलझे ही उलझे..
_ उलझन को सुलझाने में पीड़ा महसूस होती है, उलझन में पड़े रहने की आकांक्षा उठती है…यह होश ही नहीं रहता कि उलझते उलझते हम किस गर्क में आ गए हैं.
_ नीम बेहोशी में चले कि उलझे…होश में आने से डरते हैं,
_ हम इसलिए भी डरते हैं कि नीम बेहोशी में हमारे उलझने को हमारे होश में आते ही हम पर थोप दिया जाएगा…हजारों लांछन लगाए जाएंगे…उपहास उड़ाया जाएगा.
_ इसकी चिंता छोड़ ही देनी चाहिए…जो बीत गया बेहोशी में…उसे छोड़ ही दो…जो घटित हो गया हमारे अध्यान में उसे जाने ही दो.
_ राह में चलते हुए न जाने कितनी दफा हम भटक ही जाते हैं…
_ भटक जाना परेशानी नहीं है…भटक कर वहीं खड़े हो जाना परेशानी है…।
_ कई बार मार्ग में हम गिर पड़ते हैं…गिर पड़ना मुसीबत नहीं है…गिरकर न उठ पाना मुसीबत है.
_ अपने उलझन का सिरा पकड़िए…कठोर हाथों से नहीं…बिल्कुल नर्म स्पर्श के साथ…आहिस्ता आहिस्ता सुलझाइए….
_ कुछ समय बाद ही आपके बेहोशी…आपके अध्यान की उलझन सुलझने लगेगी।।
– अविनाशराही
error: Content is protected