सुविचार – पानी, जल, नीर, वाटर, Water – 145

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पानी, दूध, अनाज, विद्युत ऊर्जा [ इलेक्ट्रिक ] या पेट्रोल- डीज़ल की बर्बादी और पर्यावरण की अशुद्धता- ऐसी समस्या है,

__जिस पर हम यदि गंभीर नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ी हमारी लापरवाही को भुगतेगी. _हमें अपने ‘साक्षर’ नहीं, सुशिक्षित होने का व्यवहार करना चाहिए.
_एक कहावत है- `बचाया हुआ यानी कमाया हुआ.’
How long until we run out of fresh water ?

Unless water use is drastically reduced,severe water shortage will affect the entire planet by 2040.
“There will be no water 2040 if we keep doing what we’re doing today.” – Professor Bejamin Sovacool, Aarhus University, Denmark.
कब तक हमारा ताज़ा पानी ख़त्म हो जाएगा ?
जब तक पानी का उपयोग बहुत कम नहीं किया जाता, 2040 तक पानी की गंभीर कमी पूरे ग्रह को प्रभावित करेगी.
“यदि हम वही करते रहे जो हम आज कर रहे हैं तो 2040 तक पानी नहीं होगा.”
– Professor Bejamin Sovacool, Aarhus University, Denmark.
जल की एक्सपायरी डेट क्या है ?

● जहाँ नल में जल हर दिन आता है. वहीं जल हर दिन बासी हो जाता है और हर दिन बहा दिया जाता हैं। उसकी एक्सपायरी डेट सिर्फ़ १ दिन की होती है.
● जहाँ २ दिन में जल आता है, वहाँ २ दिन में जल बासी हो जाता है और बहा दिया जाता है.
● जहाँ आठ दिन बाद जल आता है। वहाँ वह आठ दिन बाद बासी हो जाता है.
● शादी समारोह में अगली बिसलरी का सामना होते ही हाथ में रखी जल की आधी बोतल खत्म हो जाती है और उसे फेंक दिया जाता है.
● रेगिस्तान में यात्रा करते समय निकटतम जल तब तक ताजा रहता है, जब तक जल का दूसरा स्थान दिखाई न दे.
● बाँध का जल अगले मानसून तक ताजा माना जाता है.
● यदि सूखे की स्थिति बनती है तो यही जल दो से तीन वर्ष तक ताजा माना जाता है.
● जहाँ ५० फीट के बोरवेल से जल निकाला जाता है. वह जमीन के नीचे सैकड़ों साल पुराना है. यानी सैकड़ों साल पुराना जल पीने के लिए सुरक्षित है. एक्सपायरी डेट सैकड़ों साल..
● जहाँ ४०० से ५०० फीट पर बोरवेल से जल निकाला जाता है, वह हजारों साल तक ज़मीन के अंदर जमा रहता है. फिर भी चलता रहता है.
● कुल मिलाकर जल की समाप्ति हमारी कमज़ोर बुद्धि पर तय होती है.
जल का संयम से उपयोग करें, नहीं तो आपके विचार आपको मार डालेंगे.
जल है तो कल है.
पानी के कितने सारे नाम है..

आकाश से गिरे तो बारिश
आकाश की और उठे तो भाप
अगर जम कर गिरे तो ओले
अगर गिर कर जमे तो बर्फ
फूल पर गिरे तो ओस
फूल से निकले तो इत्र
जमा हो जाए तो झील
बहने लगे तो नदी
सीमाओं में रहे तो जीवन
सीमाएं तोड़ दे तो प्रलय
आंख से निकले तो आंसू
शरीर से निकले तो पसीना
हरि के चरणों को छूकर निकले तो चरणामृत.!!

सुविचार – अन्न – अनाज – 144

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“अन्न जिस धन से खरीदा जाए _ वह धन _ ईमानदारी एवं श्रम का होना चाहिए “

…तथा याद रखें _ जैसा अन्न वैसा मन..!!

जो खेतों पर मेहनत करते हैं, जो दिन रात डटे रहते हैं, भूखे प्यासे यहां तक की अपनी नींदें भी गवां देते हैं,

– उनसे पूछो अन्न का एक-एक दाना का कीमत क्या होता है..
_ कद्र करो उनकी जिनकी वजह से हम पेट भर खाना खा पाते हैं,
_ अनाज को कूड़ेदान में ना फेंको.!!
ये जितने लोग अन्न 🌾 का अपमान करते हैं, उन्हें इस वक्त गेहूं की कटाई के लिए तपती दोपहर में खेतों में भेज देना चाहिए,

इन्हें भी पता होना चाहिए जिस रोटी का ये अपमान करते हैं, वो रोटी धूप में बहाए पसीने और कलेजे पर बल और जान की परवाह किए बिना, किसी किसान के द्वारा काटे गए गेहूं से उपजी होती है,
जिसे आराम से छत के नीचे बैठकर तुम खाते हो.. और जितना जी चाहे अपने धन के रौब में उसे बर्बाद करते हो..
– रिदम राही

सुविचार – मन – Mann – 143

मन सीमित नहीं रहना चाहता, वह स्वभाव से ही अनंत को छूना चाहता है.!!
मन…

कभी कभी समझ ही नही आता कि ‘मन क्या चाहता है’,
_ कभी भीड़ में खुश है, तो कभी तन्हाई पसंद ,
_ कभी किताबों में खोया, तो कभी दर्द भरे गीतों में गुम,
_ कभी करता हैं चीखें जोर जोर से, और कभी मन है कि जरा सी आहट भी न हो,
_ कभी मीठा सा झरना, मन ही मन मुस्कुराता सा,
_ कभी इतना खिन्न जैसे, नीम की कड़वाहट लपेटा हुआ सा,
_ कभी खामोश सर्द रात के सन्नाटों जैसा, तो कभी जून की गर्मी लिए चकाचौंध सा,
_ कभी बंद आंखो की सिलवट सा सहज, तो कभी छन छन बजती पाजेब सा उद्दंडी,
_ कभी बच्चा सा कोई हठ ले बैठा हो जैसे,
_ कभी प्रौढ़ जैसा कि इशारे तक समझ जाए..!!
_ ख़ैर…
“दुनिया वही है, उसमें रंग मन भरता है”

_ ज़िंदगी के ज़्यादातर रंग मन से ही पैदा होते हैं.
_ बाहरी दुनिया वही रहती है, लेकिन मन की अवस्था बदलने पर.. वही चीज़ें बिल्कुल अलग महसूस होती हैं.
_ ज़िन्दगी के बाहर जो कुछ भी होता है, वो तो परिस्थितियाँ हैं.
_ पर परिस्थितियों का रंग कैसा दिखेगा..- वो हमारा मन तय करता है.
_ वही परिस्थिति किसी को तोड़ देती है, और किसी को मजबूत बना देती है.
_ रंग बाहर नहीं बदलते, उन्हें देखने का एंगल बदलता है.
_जब माइंड शांत हो → दुनिया ज़्यादा कोमल लगती है.
_जब माइंड परेशान हो → वही दुनिया ब्लैक & व्हाइट लगती है.
_ उदाहरण :
मन शांत हो → छोटी चीज़ें भी सुंदर लगती हैं.
मन भारी हो → बड़ी से बड़ी खुशियाँ भी फीकी लगती हैं.
मन स्पष्ट हो → निर्णय आसान लगते हैं.
मन उलझा हो → छोटी बात भी पहाड़ लगती है.
ये 4 बातें दिखाती हैं कि रंग मन से ही बनते हैं:
1. सोच बदलो, अनुभव बदल जाता है.
2. Acceptance हो तो बुरी चीज़ें भी सिखाने लगती हैं.
3. Mind clear हो तो decisions simple हो जाते हैं.
4. दृष्टि बदलने से ज़िन्दगी का ‘texture’ बदल जाता है.
एक अशांत मन दुखी होने और शिकायत करने के कारण ढूँढ़ता रहेगा..
_ एक शांत मन वैसे भी खुश ही रहता है.!!
जहां मन को समझाना पड़े… वहां कुछ न कुछ गलत जरूर है.!!
जब हम बुरे लोगों के साथ रहते हैं तो हमारा मन खराब हो जाता है.
_ अपने मन से बुरे लोगों को निकाल दीजिए, आराम मिलेगा.!!
“सच्चा जुड़ाव मन भरता नहीं — मन बदलता है.

_ जो हमें किसी के करीब लाकर — खुद से भी मिलवा दे, वही जुड़ाव नहीं… एक जीवन-संवाद होता है.”
एक भटकता मन दुखी मन है और दुखी मन से आपको गलत सुझाव ही मिल सकते हैं.

_ इसीलिए सबसे पहले आपको अपने मन को शांत करना होगा..
_ क्योंकि यही आपको शांति दिलाएगा.!!
दिनचर्या में अचानक बदलाव आते ही मन का संतुलन डगमगा जाता है.

_ जो परिचित था, जो रोज़ का सहारा था, वह एकदम अनजान-सा लगने लगता है.
_ समय वही रहता है, लोग वही होते हैं, पर भीतर कुछ ऐसा बदल जाता है कि दुनिया सच में अलग-सी महसूस होने लगती है..- जैसे अपनी ही ज़िंदगी को थोड़ा दूर से देख रहे हों.
_ असल में बदली होती है हमारी आदतों की ज़मीन, और उसी के हिलते ही पूरी दुनिया हिलती हुई प्रतीत होती है.!!
क्या है ? “मन का स्थिर होना”

स्थिरता का अर्थ यह नहीं कि मन हमेशा सोचना बंद कर दे, बल्कि ये है कि ये अब :
_ क्षोभ [irritation] से परे हो जाता है, तुरन्त प्रभावित नहीं होता..
_ बिना कारण के चंचल रहने की आदत छोड़ देता है और जो भी आए-जाए –उसे सिर्फ दिखता है, चिपकता नहीं..
> “स्थिर मन” एक झील जैसा होता है – जिसमें कोई पत्थर डाले तो हलचल तो होती है, पर वो तुरत शांत हो जाता है.
————————————————–
क्या मन एक बार स्थिर [stable] हो जाए तो कभी अस्थिर [Unstable] नहीं होता ?
नहीं – मन की प्रकृति ही चंचल है.
_ लेकिन जब एक साधक उसे समझ जाता है, तो मन के अस्थिर होने पर भी वो स्वयं अस्थिर नहीं होता.
_ यानी, मन कभी कभी अस्थिर तो हो सकता है, लेकिन आप उस अस्थिरता के साथी नहीं, साक्षी बन जाते हो.
> स्थिर होना एक अवस्था नहीं – एक स्थिर दृष्टि का नाम है.
✅ मन के स्थिर होने की एक सूक्ष्म चेक-लिस्ट [check-list] :(अंतर से पहचान)
🔹 संकेत क्या आप महसूस करते हैं ?
1. मन अपने आप शांत हो जाता है आपको मन को रोकने की कोशिश नहीं करनी पड़ती.
2. बिना वजह चिंता नहीं होती अचानक बेचैनी या कल्पना की भरमार नहीं होती.
3. बुरा बोलने वाले प्रभावित नहीं करते आप प्रतिक्रिया [reaction] के बजाय सिर्फ निरीक्षण [observe] करते हैं.
4. आप हर दिन कुछ देर मौन में रह सकते हैं और बिना मन-बहलान [entertainment] के कुछ देर बैठना सुखद लगता है.
5. विचार आते हैं, पर चिपकते नहीं.. सोच आई और चली गई – जैसे बादल आसमान में.
6. आप तुरंट नहीं टूटते या भटकते.. इमोशनल [Emotional] हलचल में भी आप स्वयं को संभाल लेते हैं.
7. आपका मन स्नेह, दया और आभार से भरा रहता है – रंजिश से ज्यादा संवेदना रहने लगती है.
> “मन के स्थिर होने की पहचान ये नहीं कि विचार नहीं आते,
– बल्कि ये है कि अब उन विचारों के आने से मैं हिलता नहीं हूं”
“” ना मन को रोका, ना डांटा, _ सिर्फ उसे देखा – जैसे जल में चंद्रमा.
_ और धीरे-धीरे वो स्वयं शांत हो गया, – जैसे कोई अपने घर लौट आया हो””
“मन का रुख”

“दिमाग बोला – सोच ले पहले,”
“दिल बोला – महसूस कर ले…”
_ मन खड़ा था दो राहों पर, एक थी शांति – एक थी उलझन से भरी..
_ जब मन ने दिल की धड़कन सुनी, चुप सा हो गया..
_ ना सोच, ना डर, ना कोई बात थी, सिर्फ एक गहरा, मौन का साथ था.
तब समझा– मन वही है, जिसका रुख जैसा हो जाये,
_ या तो साथी बन जाए, या तो भटकता ही जाए.!!
_ एक ही मन होता है, पर उसका रुख बदलता है ;
_ जब वो दिमाग के नीचे होता है, तो अशांत रहता है ;
_ जब वो दिल के साथ होता है, तो शांत हो जाता है ;
_ और जब वो आत्मा के साथ हो जाता है, तब सब कुछ प्राकृतिक रूप से सही हो जाता है __बिना प्रयास के..!!
””दिल की बात सुनने के बाद मन चुप हो जाता है – दिमाग की बात सुनने के बाद मन और बोलने लगता है””
“मन का वापसी-पत्र”

_ मन बार-बार उसी अवस्था में लौट जाना चाहता है, जहाँ सब कुछ सरल, सुंदर और अपना जैसा लगता है.
_ काश, जीवन वैसा ही रह पाता—जैसा उन अनुभवों में महसूस होता है—
_ मन बार-बार उस द्वार पर जाता है..
_ जहां कोई प्रश्न नहीं होता, सिर्फ एक शांत उपस्थिति होती है.
_ वो एक अवस्था होती है – जहां जीवन को जीने की जरूरत नहीं पड़ती, वो स्वयं ही बहता है, खिलता है.
_ शायद वही अंतर-का घर है, जहां कोई भाव कुछ मांगता नहीं – बस सब कुछ स्वयं ही पूर्ण होता है.
— क्यों मन उसी अवस्था में लौटना चाहता है ?
_ क्योंकि वहां असली “मैं” छुपा होता है – जो दुनिया के शब्द, रूप, दांव-पेच से परे है.
_ जो अवस्था “सरल, सुंदर और अपनी” लगती है – वो आपका असली स्वरूप है.
_ जीवन व्यवहारिक है, पर आत्मा अनुभवी होती है.
“जीवन भटकता है बाहर, पर मन को घर अंदर ही मिलता है”
शरीर की शुद्धता = भीतर की शांति कैसे समझ में आती है ?

अगर शरीर हल्का लगे और मन में अनावश्यक शोर कम हो जाए- यही शुद्धता का सबसे स्पष्ट अनुभव है.
1) मन हल्का लगे – अगर आप किसी भी वजह के बिना हल्का, साफ-साफ सा महसूस करते हैं – जैसा कोई बोझ नहीं – तो ये अंदरूनी शुद्धता का पहला संकेत है.
2) बिना वजह गुस्सा, जलन कम हो – जब मन शुद्ध होता है तो छोटी-छोटी बातें डिस्टर्ब नहीं करतीं.
_ आप रिएक्ट कम, ऑब्जर्व ज्यादा करते हो.
3) बातें, सोच और व्यवहार में एक “सफाई” हो – कुछ झूठ, ड्रामा, हेरफेर करने का मन ही नहीं करता.
_ जो है, वो सीधा दिखने लगता है.
4) अकेलेपन में सुकून मिले – आपको खुद से भागने की जरूरत नहीं पड़ती.
_ अकेले बैठे हो तो मन भागता नहीं – शांत हो जाता है.
5) बुरा करने की इच्छा हो ही नहीं – शुद्ध मन किसी को दुख देने का सोचता नहीं..
_ चाहे सामने कोई गलत ही क्यों न हो.
6) दिल में एक कोमलता, दयालुता टिक जाए – आपका व्यवहार नरम पड़ने लगता है.. _ ज्यादा जजमेंट नहीं होती, सिर्फ समझ होती है.
7) शरीर में हल्का-पन, सुकून, गर्माहट [warmness] महसूस हो – शुद्ध मन का असर शरीर पर पड़ता है..
_ सांस गहरी हो जाती है, सीने में जकड़न कम हो जाती है.
अगर आप अपने अंदर “सुकून + हल्का-पन + दयालुता” बढ़ती हुई महसूस करते हैं, तो वही अंदरुनी शुद्धता का सबसे असली संकेत [sign] है.!!
मन को कैसे मारते हैं ?

_ कोई मन को मारने का तरीका बताए.
_ मुझे अपने मन को मारना है.
_ यह हर पल स्वयं को सुखी समझ कर उछलता-फुदकता रहता है.
_ इस मूरख को यही नहीं पता कि सुख क्या होता है ?
_ यह समझता है कि जो ‘अपने’ होते हैं, वही सुख होता है, पर अपना तो कोई होता ही नहीं.
_ तो जो हमारे साथ रहते हैं, रोज़ मिलते-जुलते हैं, कहते हैं, हम तुम्हारे हैं, वो कौन हैं ?
_ अरे मूरख, वो सिर्फ संयोग से साथ हैं.
_ कहने का क्या है ? कुछ भी कह लो.
_ कहने में झूठ, सच एक ही अंदाज़ से बोला जाता है.
_ यह झूठ क्या होता है? मुझे लगता है, जो होता है, सब सच होता है.
_ ओफ़, तुझे यदि सब सच लगता है तो तू वाकई अपने मन को मार.
_ पर मन को मारते कैसे हैं ?
_ कोई मन को मारने का तरीका तो बताए.
_ तू सबसे मुँह फेर ले.. आगे बढ़, पीछे मुड़ कर मत देखना, आगे बढ़, और बढ़.
_ पर आगे भी लोग हैं जो कहते हैं, वो मेरे अपने हैं.
_ आँखें बंद कर, कान बंद कर, किसी की न सुन कुछ, किसी से न कह कुछ.
_ फिर भी, मन है कि मर ही नहीं रहा.
_ क्या करूँ ? क्या करूँ ?
– Manika Mohini

सुविचार – लय – रिदम – Rhythm – 142

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एक बार कोई भी लय टूट जाए तो दोबारा लय में आना आसान नहीं होता.

Once any rhythm is broken, it is not easy to get back into rhythm.

जीवन जीने के लिए भी लय अर्थात रिदम बहुत ज़रूरी है,

_बिना किसी बाधा के अपनी तन्मयता बनाकर रखिए .!!

सुविचार – कर्म – काम – कार्य – 141

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आपका आज का परिणाम आपके अतीत के किये हुए कर्म हैं,

_ भविष्य बेहतर बनाना है तो आज के फैसलों को बदल दो.

लोग कर्मों पर विश्वास नहीं करते.

_ कईओं के साथ बहुत बुरा होते देख चुकी हूं, लेकिन उन्हें इस बात की समझ ही नहीं कि उनके किसी बुरे कर्म का फल मिला है.
_ समझ हो तो वे बुरा कर्म करने से बचें.
_ सबको अच्छे और बुरे, सही और गलत, पाप और पुण्य का ज्ञान होना चाहिए.
– Manika Mohini
सही कर्म वह नहीं है, जिसके परिणाम हमेशा सही हो !

_ सही कर्म वह है, जिसका उद्देश्य कभी गलत ना हो !!

किसी भी काम से खुशी मिलनी चाहिए, तनाव और चिंता नहीं.

_ शरीर का स्वास्थ्य सबसे पहले है ; इसके लिए काम और आराम का संतुलन चाहिए.. जो हर शख्स अपने लिए तय करे.!!
काम ऐसे करो क़ि लोग देखते रह जाएँ,

_ और अगर काम न करना हो तो ऐसे आराम करो क़ि लोग सोचते रह जाएँ.!!

रोनाधोना करने वाले तो कर्म हीन होते हैं,

_ जो स्वयं कुछ नहीं करना चाहते.. बस सारा दिन दूसरों में दोष ढूंढ़ते रहते हैं.!!

ख़ुद काम कर के कम कमाना,

_ किसी दूसरे से मदद मिलने की उम्मीद से तो बेहतर ही है.!!

कोई भी काम तुरंत शुरू न करें, पहले सोचें कि यह किस तरह होगा ?

_ कदम उठाने के पहले उसके सही- गलत की अच्छी तरह जांच करें.!!

कर्म करते वक्त हम बेपरवाह होते हैं, पर जब उसका कड़वा फल सामने आता है, तो सिवाय आंसुओं के कुछ नहीं बचता.!!
काम करो ऐसा कि पहचान बन जाए ; हर कदम चलो ऐसा कि निशान बन जाए.

_ यहाँ ज़िन्दगी तो सभी काट लेते हैं, ज़िन्दगी जियो ऐसी कि मिसाल बन जाए.!!

जीवन में सिर्फ़ अपने काम हो ही अपना किरदार मत बनाईए.
_ आपका जीवन और आपकी क़ीमत उससे कहीं ज़्यादा है.!!
जैसे बीज छोटा होता है और फल बड़ा,

_ वैसे ही हमारे छोटे-छोटे कर्म, बड़े परिणाम ला सकते हैं.!!

सही कर्म वह नहीं है, जिसके परिणाम हमेशा सही हों ;
_ सही कर्म वह है, जिसका उद्देश्य कभी गलत न हो.!!
“कर्म में पूरी तरह जुड़ो… पर भीतर से हल्के रहो..

– यही जीवन को अर्थ भी देता है और शांति भी”
जो काम पेट भरता है, घर चलाती है और दिमाग खोलती है..

_ उसमें लज्जा-शर्म रखना नुकसान ही देगा.!!

कर्म वर्तमान में निहित है और बिना ध्यान और एकाग्रता के किया गया कार्य पूर्ण और संतोषजनक परिणाम नहीं दे सकता.!!
दूसरों की पहचान से आप मशहूर तो हो सकते हैं, पर इज़्ज़त सिर्फ अपने काम से मिलती है.!!
जब आपके कर्म वापस आते हैं, तो आपकी सारी चालाकियाँ.. बेकार साबित हो जाती है.!!
यदि आप जरूरी काम करना छोड़ -हर फालतू और बेकार काम कर रहे हैं तो आप स्वयं दोषी हैं.!!
जब ज़िंदगी तक़लीफ़ देती है, तब अपने किये सारे कर्म याद आतें है…!
जब काम मिल रहा था, तब काम की कद्र नहीं की..
_ अब गया वक्त लौट कर नहीं आता.!!
करिए, कर डालिए! काम यदि सही है तो हिचक कैसी ?

_ जितना सामर्थ्य हो जितनी बुद्धि ज्ञान हो उतने से ही शुरू कर दें,
_ उसके बाद आगे रास्ता अपने आप बनना शुरू हो जाएगा.!!
अगर अच्छे कामों पर भी लोग शक करें तो फिक्र मत करो,
_ सोने की ही तो परख होती है, कोयले की परख कोई नहीं करता.!!
सही सोच के साथ जीवन में खुद को आगे बढ़ाए और औरों के लिए भी प्रेरणा बनने की कोशिश करें..

_ जीवन में जो भी आप दोगे, वही आपको भी मिलेगा.
_ कर्म लौट कर आता है.. सतर्क रहें सुरक्षित रहें.!!
कर्म ही भाग्य है, अपने कर्म ठीक रखें.

_ कर्म अच्छे होंगे तो बिगड़े काम भी बन जाएंगे.
_ अन्यथा सब किया हुआ नष्ट हो जाता है.
_ आप कितनी भी मेहनत कर लो,
_ आपकी नियत ठीक नहीं है तो.. सब मिला हुआ खो जाता है.!!
कोई किसी के कर्म का भागीदार नहीं होता..

_ सबकुछ अपने कर्मों से घटित होता है,
_संचित कर्मों से लेकर नये कर्म तक इंसान का साथ कभी नहीं छोड़ते..
_ वो हमें तबतक पकड़े रखते हैं, जबतक हम उनको भोग न लेते..!!

सुविचार – चेहरा – चेहरे – चहरे – चहरा – चेहरों – मुखौटा – मुखौटे – शक्ल – नकाब – 140

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मैं किसी का चेहरा पढ़ने की कोशिश नहीं करता, लेकिन ये सच है कि कुछ चेहरों पर अजीब सी चमक होती है, जैसे भीतर कोई दीपक जल रहा हो.

_ और कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिन पर जैसे कोई अनकहा बोझ रखा हो.
_ फर्क बहुत बड़ा नहीं होता, लेकिन बहुत गहरा होता है.
_ एक ने जीवन जिया होता है, दूसरे ने कुछ भी करके पैसा कमाया होता है.!!
– Sanjay Sinha
चेहरा तो मिल जाएगा हमसे भी ख़ूबसूरत..

_ बात जब दिल की आएगी तो हार जाओगे..!!

हमारे यहाँ चेहरे की खूबसूरती तो देखते हैं..

_पर चेहरे के अंदर दिमाग नहीं देखा जाता.!!

अब तो मन को भी किसी से मिलकर खुशी नहीं मिलती,

_ लोगों के चेहरों पर इतने मुखौटे हैं कि किसी से बात करने में भी घबराहट होती है.
“जब बाहर के झूठे चेहरे समझ आने लगें तो समझो — मन अब सच्चाई को पहचानने लगा है”
स्वयं के लिए मैं कुछ और हूँ, घरवालों के सामने कुछ और, दोस्तों के बीच कुछ और.. – और दुनिया की नज़रों में बिल्कुल कुछ और..!

_ कभी-कभी सोच में पड़ जाता हूँ इन सब रूपों में से असली मैं कौन हूँ ?
_ मेरी वास्तविकता आख़िर किस चेहरे, किस ख़ामोशी,किस कोने में वास करती है.!!
कुछ लोग चेहरे पर.. अपने बने रहने का नकाब लगाकर मिलते हैं, और फिर धोखा देते हैं.!!
इस दौर में एक बात अच्छी हुई है, लोगों के चेहरे साफ दिखने लगे हैं..!!
चेहरे की रौनक छीनने वालों से कभी मुलाकात ना हो तो बेहतर है.!!
जिन लोगों का बड़ा मान-सम्मान करते थे, उन लोगों का भी दोहरा चेहरा सामने आया.!
“बनावटी मुस्कुराहटों का मुखौटा ओढ़े.. यहां सब नाख़ुश से हैं !”
शक्ल की कम खूबसूरती भी एक अनमोल नेमत है,

_ जो हमें अपने अंदर की असली खूबसूरती पहचानना सिखाती है.!!
चेहरे से इंसान पहचानने कि कला थी मुझ में,

_हैरानी तब हुई जब इंसान के पास बहुत चेहरे देखे..!!

अब इंसान को चेहरा देख कर नहीं पहचाना जा सकता,

_अब लोगों के चेहरों पर मुखौटे चढ़ गए हैं..!!

चेहरे पे चेहरे, लोगों ने पोत रखे इतने..

_ एक–दो जान भी लो, फिर भी आप अंजान ही रहोगे..!!

आप छोड़ दो कोशिशें इंसानों को पहचानने की..

_ यहां जरूरतों के हिसाब से सब नकाब बदलते हैं..!!

कमाल के कलाकार हैं वो जो हर जगह नया नकाब पहनते हैं ; पर अफ़सोस !!

_ आख़िर में उनका असली चेहरा भी पहचानने लायक नहीं बचता.!!

हम दूसरों की नज़रों में अच्छे दिखने के लिए जीते हैं, जबकि सवाल ये है, क्या हम खुद की नज़रों में सच्चे हैं या किसी मुखौटे के पीछे छिपे हुए हैं.!!
ये लफ्ज़ इस चहरे से मेल नहीं खाते…

_ इतनी गहरी लाइनें तो किसी झुर्रीदार चहरे की मिल्कियत होती हैं….अक्सर.!!

हर चेहरे की मुस्कान को सच मत समझो.. बहुत सी मुस्कानें चेहरे पर इसलिए चढ़ाई जाती हैं कि अपना दर्द छुपा रहे और दूसरों के चेहरे पर मुस्कान बनी रहे.!!
दुनिया आपको विकल्प समझेगी, और निगल लेगी आपके चेहरे की रौनक,

आप अपनी खुशियों की जिम्मेदारी खुद लेना…
आप खुद की प्राथमिकता हो इस पर अड़े रहना.!!
जब दुनिया का असली चेहरा पास से दिख जाए.. तब सबसे दूर रहना भी एक तरह की बुद्धिमानी बन जाता है.!!
कुछ अँधेरे ही अच्छे हैं, कम्बख्त रोशनी में अपनों के असली चेहरे सामने आ जाएंगे..!!
चेहरों से पहचान होती है,_चेहरों से परख नहीं होती !!
रंग चेहरे के बोल पड़ेंगे, उनसे बस बात छेड़ना मेरी..!!
धोख़ा देती है शरीफ चेहरों की चमक अक्सर..

_ हर कांच का टुकड़ा हीरा नहीं होता..!!

जो हो वही रहो, नक़ाबों की दुनिया में असली चेहरों की क़ीमत ज़्यादा होती है.!!
यहाँ सिर्फ मुस्कुराते चेहरे दीखते हैं,

_ पर आँख का पानी का रंग मुस्कुराते चेहरे से मेल नहीं खाता, वो अपना अलग राग गाता है.!!

झूठ बोलना आता तो शायद कुछ चेहरे आज पास होते..

_ पर क्या करूं, दिल ने कभी सच्चाई से समझौता करना नहीं सीखा.!!

चेहरा सिर्फ मन की बात नहीं कहता,

_ बल्कि किसी के पूरे व्यक्तित्व को आप उसके चेहरे में पढ़ सकते हैं.
_ विद्वान व्यक्ति का नूर उसके चेहरे पर झलकता है.
_ मूर्ख व्यक्ति की मूर्खता भी उसके चेहरे पर नज़र आती है.
आदमी को सिर्फ वहम है, पास उसके ही इतना गम है.

_ पूछो हँसते हुए चेहरों से, आंख भीतर से कितनी नम है.!!
मुखौटे नहीं है यह .. हर किसी के मन में अपनी छवि अंकित होती है.. जो आहत होती रहती है बार बार.!!
किसी इंसान की सहनशीलता को इतना ना परखो कि वो चुप्पी छोड़कर आपके हर मुखौटे को गिरा दे.!!
अगर मुस्कराहट से चेहरे का आकर्षण बढ़ जाता है, तो वह चेहरा सुन्दर है,
_ अगर उससे कोई अन्तर नहीं पड़ता तो वह साधारण है और अगर मुस्कराहट उसे बिगाड़ देती है,
तो वह चेहरा बदसूरत है.
यदि आपको ज्यादातर लोगों के असली चेहरे और असली इरादे दिखने लगें, जो वो अपने चेहरे के पीछे छुपाते हैं,

_ तो हो सकता है कि आप बिल्कुल अकेले हो जाएं..!!

कभी-कभी हमारा अनुभव कठिन रहता है, लेकिन याद रखना हर कोई नकाब के पीछे नहीं छुपता..

_ वहाँ सच्चे, दयालु लोग हैं जो वास्तविक आपको देखेंगे और सराहना करेंगे.

_ सार्थक कनेक्शन की संभावना के लिए खुले रहें – कभी-कभी, यह सबसे अप्रत्याशित स्थानों पर होता है कि हम उन लोगों को पाते हैं जो वास्तव में परवाह करते हैं.

“अपना चेहरा दूसरों से छिपाना आसान है, लेकिन अपनी मूर्खता छिपाना नामुमकिन है.”

“It’s easy to hide your face from others, but it is impossible to hide your stupidity.”
उफ़ ! कितना लम्बा यह जीवन !

_ जैसे-जैसे हम जीवन जीते जाते हैं, वैसे-वैसे हमारा चेहरा बदलता जाता है.
_ सिर्फ उम्र की लकीरें नहीं, हमारे जीये हुए सुख-दुःख भी हमारे चेहरे पर लकीरें छोड़ जाते हैं.
_ जिसने जीवन में जितने ज्यादा दुःख भोगे होते हैं, या महसूस किए होते हैं, उसका चेहरा उतना ही ज्यादा बुढ़ाया हुआ लगता है.
_ चेहरा हमारे मन की किताब होता है, इसलिए इस पर ताज़गी बनाए रखने के लिए हमेशा खुश रहें.!!
– Manika Mohini
लोग कहते हैं कि… चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतरकर देखो ना..!!

_ लेकिन मैं आपसे कह रहा हूँ … चेहरा ही देख लो मेरा,
_ क्योंकि दिल में उतरने भर की जगह भी नहीं है.
_ वैसे भी दिल मेरा खून से भरा है और उसमें उतर भी गए तो.. मेरा खून ही चूसोगे.!!
ये जो दुनिया में बड़े-बड़े महान अमीर लोग दिखते हैं और जिन्हें आप अपना आदर्श मान बैठते हो, यह आवश्यक नहीं कि वो वैसे ही हैं.. जैसे आपको नज़र आते हैं.

_ क्योंकि वास्तविक दुनिया.. दिखने वाली दुनिया से विपरीत होती है.
_ इन बड़े-बड़े महान नामी चेहरों के पीछे कितना घिनौना नीच इंसान छुपा हो सकता है, यह आप कल्पना भी नहीं कर सकते.!!
“दुनिया में जो लोग ऊँचाई पर नज़र आते हैं, ज़रूरी नहीं कि भीतर से भी उतने ही उजले हों.
_ दिखने वाली सफलता अक्सर एक मुखौटा होती है, और असली दुनिया – उसके ठीक उलट.
_ शायद इसी वजह से यहाँ भरोसा करने से डर लगता है”
_ और सच कहूँ तो… यह डर कमजोरी नहीं है, यह अंतरदृष्टि है.
_ जो लोग जल्दी आदर्श नहीं बनाते, वे अक्सर गहराई से देखना जानते हैं.!!
हाँ, यह बात थोड़ी कठोर लेकिन सच्ची है.

_ जैसे-जैसे उम्र और अनुभव बढ़ते हैं, बहुत से लोगों को दुनिया से थोड़ा-सा मोहभंग होने लगता है.
_ इसके कुछ कारण होते हैं :
1. हम लोगों को असल रूप में देखने लगते हैं.
_ युवा उम्र में हम मानते हैं कि लोग वैसे ही होंगे जैसे वे कहते हैं.
_ समय के साथ दिखता है कि कहना और होना अलग-अलग है.
2. अपेक्षाएँ धीरे-धीरे टूटती हैं.
_ हम सोचते हैं कि रिश्ते हमेशा सच्चे होंगे, लोग न्यायप्रिय होंगे.
_ जब ऐसा नहीं होता, तो भीतर एक थकान पैदा होती है.
3. समझ बढ़ती है, पर मासूमियत कम हो जाती है.
_ यह जीवन का स्वाभाविक चरण है –
_ समझ बढ़ती है, पर सरल विश्वास थोड़ा कम हो जाता है.
_ लेकिन यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण मोड़ भी होता है.
_ यही समय है जब इंसान दो रास्तों में से एक चुनता है:
_ या तो कड़वाहट में जीना, या शांत समझ के साथ जीना..
_ जो दूसरा रास्ता चुन लेते हैं, वे धीरे-धीरे समझ जाते हैं:
“दुनिया पर भरोसा कम भी हो जाए, तो भी जीवन पर भरोसा रखा जा सकता है”
“समझ बढ़ने का दुख यह है कि भ्रम टूट जाते हैं, पर सौभाग्य यह है कि सच दिखाई देने लगता है”
और एक अंदर देखने वाला प्रश्न:
“क्या मैं दुनिया से निराश हो रहा हूँ,
या मैं दुनिया को पहली बार सही रूप में देख रहा हूँ ?”
**“जो कहा जाए उसे तुरंत मत मानो.

_ जो दिखे उसे अंतिम सत्य मत समझो.
_ प्रश्न करो, परखो, फिर अपने विवेक से स्वीकार करो.
_ क्योंकि यह समय धुंध का समय है- जहाँ रोशनी भी कई बार भ्रम पैदा करती है.
_ ऐसे समय में सवाल करना ही मनुष्य को जाग्रत और सही राह पर रखता है”**
– “धुंध भरे समय में सवाल करना ही इंसान की सबसे सच्ची रोशनी है”
“प्रश्न करना मन को जाग्रत रखता है, पर विश्वास ही जीवन को गरमाहट देता है”
– “जो हर बात पर प्रश्न करना सीख गया, उसके लिए सच का रास्ता धीरे-धीरे साफ़ हो जाता है”
– हर बात को आँख बंद करके मत मानो, लेकिन हर बात को शक से भी मत देखो ;
समझो, परखो, फिर अपने विवेक से स्वीकार करो.
आदमी जो बोलता है उस पर शक करो,

_ जो भी करता है उसे शक की निगाह से देखो,
_ जो समझता है उस पर सवाल करो,
_ जो उत्तर देता है उन उत्तरों पर उल्टे प्रश्न करो,
_ कुल मिलाकर बात यह है कि यह सब करने से हमारे विश्वास, भरोसे और हमारी धारणाएं पुख्ता होंगी और हमें रास्ते बहुत साफ नजर आएंगे.
_ क्योंकि यह समय ऐसा समय है जब हम धुंधलकों में है, अंधियारे हमें दिग्भ्रमित कर रहें हैं,
_ हमें ऐसे संदर्भों से मुब्तिला कर रहें है कि हम बहुत दयनीय स्थिति में है और जाहिर है सारी विपरीत परिस्थितियों के बाद भी हमारा ठीक रहना और खुश रहना बहुत जरूरी है.
– Sandip Naik
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