सुविचार – किसी के अंदर इतना भी मत झांको कि अपनी नाक को कपड़े से ढकना पड़े. – 258 | Sep 25, 2014 | सुविचार किसी के अंदर इतना भी मत झांको कि अपनी नाक को कपड़े से ढकना पड़े. _ कभी-कभी हम जिज्ञासा या लगाव में दूसरों के भीतर इतना झांकने लगते हैं कि उनके छिपे हुए अंधेरे, कमज़ोरियाँ या असलियत हमें असहज करने लगती है. _ तब हमें खुद को बचाने के लिए “नाक ढकनी” पड़ती है—यानी दूरी बनानी पड़ती है. _ हर इंसान के भीतर कुछ सुंदर होता है और कुछ बोझिल भी.. _ हमें इतना ही देखना चाहिए जितना हमारे लिए आवश्यक और स्वस्थ हो. _ क्योंकि दूसरों की गहराइयों में उलझकर हम अपनी रोशनी को धुंधला नहीं कर सकते. _ असली संतुलन यही है: जानकारी और दूरी, अपनापन और सीमाएँ—इनके बीच सही रेखा खींचना.!!
सुविचार – राह, रास्ता, पथ, मार्ग, रास्ता, पगडंडी, पंथ – 257 | Sep 15, 2014 | सुविचार दूसरों की राहें रोशन करो यूँ ही, तुम्हारी अपनी चमक कम नहीं होगी कभी.!! “हम किसी को रास्ता दिखा सकते हैं.. किसी के बदले चल नहीं सकते.” हम अक्सर मान लेते हैं कि जो रास्ता हमने नहीं चुना, शायद वही बेहतर था. _ लेकिन अगर हम सचमुच उस रास्ते पर जाते, तो वहाँ भी कठिन फैसले होते, कुछ लोग मिलते, कुछ छूटते और कुछ नए पछतावे पैदा होते.!!
सुविचार 256 | Sep 13, 2014 | सुविचार जब आपको एक आईडिया मिल जाए जिसके बारे में सोचना बंद ना कर सकें, …… तो ये आगे बढ़ने के लिए एक अच्छा अवसर है.
सुविचार – दुनिया के पाँच सबसे दिलचस्प नियम – 255 | Sep 13, 2014 | सुविचार दुनिया के पाँच सबसे दिलचस्प नियम :- 1. जिससे डरते हो, वही घटित होने की संभावना सबसे अधिक होती है. (यानी छाता भूलो तो बारिश तय है.) 2. समस्या को साफ़-साफ़ लिख दो, आधा हल तो वहीं हो गया. (काग़ज़ और कलम कभी धोखा नहीं देते.) 3. काम उठाया है तो उसे सही ढंग से पूरा करना तुम्हारी ही ज़िम्मेदारी है. (बहाने नहीं, उपाय खोजो.) 4. ज्ञान और बुद्धि को प्राथमिकता दो, धन अपने आप पीछे-पीछे आएगा. (सच्ची पूँजी दिमाग़ है, जेब नहीं.) 5. जहाँ निर्णय लेना ज़रूरी न हो, वहाँ निर्णय मत लो. (कभी-कभी “रुकना” ही सबसे समझदारी है.) _ ये नियम हमें याद दिलाते हैं कि जीवन केवल तर्क नहीं, बल्कि अनुभव और दृष्टिकोण का खेल है. – विजय प्रभाकर नगरकर
सुविचार – “सही दिशा में बढ़ना” – 254 | Sep 12, 2014 | सुविचार “सही दिशा में बढ़ना” _ ज़िंदगी में आगे बढ़ना कोई बड़ी बात नहीं, हर कोई किसी न किसी दिशा में भाग रहा है. _ मुद्दा ये नहीं कि हम चल रहे हैं या नहीं, मुद्दा ये है कि किधर जा रहे हैं और क्यों जा रहे हैं. _ सही दिशा अक्सर धीमी लगती है, क्योंकि वहाँ शोर नहीं होता, बस सच्चाई होती है. “तेज़ चलने से ज़्यादा ज़रूरी है — सही दिशा में चलना” “चलना आसान है, लेकिन सही से आगे बढ़ना ?” _ यह एक पूरी तरह से अलग बात है.!!