सुविचार – हमें कब किसी को मैसेज और कॉल करना बंद कर देना चाहिए – 139

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आज मैं आपको बताऊँगी कि हमें कब किसी को मैसेज और कॉल करना बंद कर देना चाहिए 2 मिनट निकालकर इसे जरूर पढ़ें :—

1 — जब आप को अंदर से यह अहसास होने लगे की मात्र उसका अटेंशन और प्यार पाने के लिए आपको अपनी Self Respect खोनी पड़ रही है तब आपको उसे कॉल और मैसेज करना बंद कर देना चाहिए।
2 — जब वे आपकी‌ कॉल और मैसेज का रिप्लाई देने में लंबे अंतराल या कई दिनों के बाद देने लगे जबकि दूसरी तरफ वह दूसरों के लिए वह आसानी से उपलब्ध है तब आपको उसे कॉल और मैसेजेस करना बंद कर देना चाहिए।
3 — जब वे बातचीत जल्दी खत्म करने के बहाने बनाने लगे, लेकिन जब आप ऐसा नहीं करने देते तो वे पुरानी बातों से कोई न कोई इलज़ाम थोपने लगे तब आपको उस से कॉल और मैसेज करना बंद कर देना चाहिए।
4 — जब वे आपसे बात ना करने के नए नए बहाने खोजने लगें, उनकी जिंदगी में क्या चल रहा है जब यह बताने में कतराने लगे, तब उसे कॉल और मैसेजेस करना बंद कर देना चाहिए।
5 — जब वे हमेशा आपका अपमान करने लगें, आपकी इस शिकायत पर की समय क्यों नहीं दे रहे हैं आपको बहानों कि एक लंबी सूची देने लगे, तब आपको उसे कॉल और मैसेजेस करना बंद कर देना चाहिए।
यह कुछ मेरे खुद के तजुर्बे से मैंने आपको यह बातें बताई हैं।
मैं आशा करती हूं कि आपको यह मेरी पोस्ट पसंद आई होगी।
मेरी पोस्ट पढ़ने के लिए आपका तहे दिल से धन्यवाद।🙏🏻💐
– Neha Chandra

सुविचार – ग़लतफ़हमी, गलतफहमी, गलतफ़हमी – 138

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ग़लतफ़हमी ……

किसी भी तरह की ग़लतफ़हमी दिल में न पालें, इसके आधार पर कोई भी सम्बन्ध न तोड़ें, जब भी किसी बात पर शंका हो बातचीत के जरिये उसे सुलझाने का प्रयास करें, याद रखें ज्यादा त्तर गलत फहमी हमारे शंकालु दिमाग या परिस्थितियों की उपज होती है !!

अगर आप सोच रहे हो कि वक़्तके साथ ज़िंदगी आसान हो जाएगी..

_ तो इस ग़लतफ़हमी से निकलो यार.. मज़बूत तो आप को ही होना पड़ेगा.!!

खुशफ़हमी असल में होती तो ग़लतफ़हमी ही है,

_ बस हम किसी ग़लतफ़हमी के सच होने के मुगालते में उसे खुशफ़हमी कह देते हैं.

इस गलतफहमी में मत रहिए कि कोई आपको आपके मधुर स्वभाव की वजह से पसंद करता है.

_ हो सकता है कि आप बस उसका खाली समय बिताने का एक ज़रिया हों.!!
जुड़े रहने के लिए बेइंतहा भरोसा चाहिए..

_ बिछड़ने के लिए एक गलतफहमी ही काफ़ी है..!

अगर आप को पूरी बात नहीं पता तो चुप रहना ही बेहतर है,

_ अधूरी जानकारी से राय बनाना ग़लतफ़हमी जो जन्म देता है.!!

गलतफहमी मत पालो की बर्दाश्त करने वाला हमेशा चुप ही रहेगा..
_ कभी-कभी वो सबसे बड़ा तूफान बन जाता है.!!
गलतफ़हमियाँ ज़रूरी हैं खुश रहने के लिए..- गलतफ़हमियाँ जीने का सहारा होती हैं.
अपने मन में ख़ुद को लेकर गलतफहमी कभी मत पालो और न ही ख्याली पुलाव की दुनिया में जियो.!!

सुविचार – दुख – दुःख – 137

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साइकोलॉजी के अनुसार : आपको दुःख तभी होता है, जब आप किसी व्यक्ति या किसी बात को अपने मन में महत्व देते हैं,

_ अगर आप उस व्यक्ति या उस बात को महत्व देना बंद कर दें, तो दुख भी अपने आप कम हो जाएगा !
_ जब भी आप को दुखी होने का ख्याल आए, ख़ुद से कहें कि इस व्यक्ति या इस बात को महत्व देने से कोई फायदा नहीं है.
_ यही एक मानसिक तरकीब है, जिससे आप चैन से जी सकते हैं,
_ वरना, आप ज़िन्दगी भर किसी न किसी बात को लेकर दुखी होते रहेंगे..!!
खुशियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे हमेशा कभी पूरी नहीं होती और गाहे-बगाहे कम पड़ जाती हैं,

_ जबकि हमारे दुख अपने आपमें – भले एक या बहुत छोटे हो – संपूर्ण होते हैं और इतने भरपूर होते हैं कि वे एक जीवन क्या, समूची कायनात को हिलाकर रख सकते हैं,
_ इसलिए खुशियों को तवज्जों मत दीजिए, दुखों से मनमिली दोस्ती कीजिए, प्यार कीजिए – जीवन खुद-ब-खुद गुलज़ार रहेगा.!!
– Sandip Naik
हम दुखी इसलिए नहीं होते कि जीवन में मुश्किलें आती हैं, बल्कि इसलिए दुखी होते हैं, क्योंकि हमने जीवन से पहले ही बहुत सारी उम्मीदें और कल्पनाएँ जोड़ ली होती हैं.

_ जब जो होता है, वो हमारी बनाई हुई उस तस्वीर से मेल नहीं खाता,
तो मन उसे स्वीकार करने से इनकार कर देता है.
_ और यही इनकार, यही विरोध — असल में दर्द बन जाता है.
_ वही बारिश एक किसान के लिए आशीर्वाद है, क्योंकि उसकी अपेक्षा ठीक वही थी.
_ लेकिन उसी बारिश से शादी वाले घर में लोग परेशान हो जाते हैं, क्योंकि उनकी अपेक्षा कुछ और थी.
_ घटना तो एक ही है — दुख कहीं बाहर नहीं, बल्कि टूटी हुई अपेक्षा के अंदर पैदा होता है.
– राहुल आर्यन
लोगों की नजर में सुख दुख सिर्फ पाने और खोने का नाम है.

_ यानी जो हम चाहें, वह हमें मिल जाए, तो हम सुखी, अन्यथा दुखी. यह सत्य नहीं है.
_ पाने और खोने में सिर्फ तात्कालिक सुख दुख निहित होता है.
_ पाई हुई वस्तु या इंसान को आप ताउम्र पाए रहेंगे, यह आश्वस्ति उस पाने में शामिल नहीं होती.
_ पाई हुई वस्तु ताउम्र आपको खुशी देगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती.
_ पाने के बाद कोई अन्य वस्तु, हालात से आप परेशान हो सकते हैं जिसका पाने खोने से कोई ताल्लुक न हो.
_ सब कुछ पाने-मिलने के बाद भी किसी नापसंदगी के लिए मन परेशान हो जाता है.
_ सिर्फ मिलना या ना मिलना ही सुख या दुख का कारण नहीं होता.
_ बात गहरी है.
– Manika Mohini
पहले दुःख भाँप लिया जाता था. अब दुःख मापा जाता है.
_ उसका दुःख कम मेरा दुःख ज़्यादा.
_ इस आधार पर लोगों ने दुःख सुनना और अपनी संवेदनाएँ देना तय कर लिया है.
_ सच कहूँ तो सुन कोई नहीं रहा होता है और झूठी संवेदनाएँ सबके पास है.
_ असल में दुःख बाँटने की अवधारणा इतनी खोखली है ये कोई जानना ही नहीं चाहता है.

_ अनसुने किए गये दुःख, और झूठी संवेदनाओं के इस दौर से ही दुःख का कारोबार अच्छा चल नहीं रहा.
_ दुःख बेच तो सब रहे हैं, पर दुःख इस बात का भी है कि ख़रीदार यहाँ कोई नहीं.
_ खुश दिखने वाले चेहरों का मोल है यहाँ बेशक़ीमती है.
_ दुःख से भरे चेहरों की क़ीमत कबाड़ी की दुकान में पड़े रद्दी से भी कम है.
_ वास्तविकता यही है, मुँह नहीं मोड़िए.
– यूँ हीं
– पथिक मनीष
मुझे लगता हैं कि जीवन को जीने में हम ज़रूर कोई गलती कर रहे हैं…जो यह इतना दुःख दे रहा है..

_ क्योंकि ये सच नहीं हो सकता…इतना दुःख हो ही नहीं सकता.!!
_ शायद जीवन गलती नहीं कर रहा — बस हमें यह दिखा रहा है कि हम अभी अपने सच्चे स्वरूप से कितने दूर हैं.
_ दुःख वहीँ जन्म लेता है.. जहाँ हम वास्तविकता से टकराते हैं.
_ कभी-कभी यह दुःख-पीड़ा, जीवन का सबसे गहरा आमंत्रण होती है — भीतर झाँकने का, यह देखने का कि “मैं कौन हूँ” जब सब कुछ टूट रहा होता है.
_ हो सकता है, दुःख हमें गलत नहीं, बल्कि सही दिशा की ओर मोड़ रहा हो.!!
दुख ही जगाता है, सुख तो सुलाता है.!!
“जीवन में इतना दुःख नहीं हो सकता..
_ शायद गलती जीवन में नहीं, हमारे जीने के तरीके में है.”
_ जीवन को जीने में हम ज़रूर कोई गलती कर रहे हैं.. जो यह इतना दुःख दे रहा है.!
_ क्योंकि ये सच नहीं हो सकता…इतना दुःख हो ही नहीं सकता.!!
कुछ बुरा हो जाए तो यह सोच कर तसल्ली करनी पड़ती है कि इससे भी ज़्यादा बुरा हो सकता था.

_ दुख में सब्र करने का यह अचूक नुस्खा है कि यह सोचिए, इससे बड़ा भी दुख हो सकता था.
_ कुछ बुरा हो जाए तो यह सोच कर तसल्ली कीजिए कि इससे भी ज़्यादा बुरा हो सकता था.
_ दुख सहने की शक्ति मिलेगी.!!
अगर दुख में आप रस लेने लग गए, तब तो आप ने सुख के सब द्वार बन्द कर दिए. _ दुखी रहते- रहते, बहुत दिन तक दुखी रहते- रहते दुख के साथ संग बन गया, संबध बन गए. _ फिर तो अगर कोई आ भी जाए सुख देने, तो भी आप द्वार बन्द कर लेंगे.!!
हर व्यक्ति को लगता है कि उसी ने सबसे ज्यादा दुःख झेलें हैं, लेकिन सच तो यह है कि हमसे भी ज्यादा दुःख झेल चुके लोग हिम्मत के साथ लड़ रहे हैं.!!
कभी-कभी जो दरवाज़ा बंद हो होता है, वह हमें दुख से बचाता है.

_ गलत जगह से हटना हार नहीं, अपने सम्मान का चयन है.
_ नियति जब रुख मोड़ती है तो इसलिए कि.. आगे कुछ अधिक उपयुक्त और विशाल आपका इंतज़ार कर रहा है.!!
ये हिसाब नहीं रखना की कितना पाया कितना गवाया..!

_ बस चाहत इतनी हो कि दुख वहाँ से न मिले.. जहाँ अपना सुख लुटाया..!!
जिदंगी जीना ही है तो क्या सुख क्या दुख..
_ और दिहाड़ी लगानी है तो क्या छांव क्या धूप.!!
“दुख की जड़ कमी नहीं…

_ अधूरी उम्मीदें और लगातार औरों से तुलना है.”
एक दिन हम अपने दुःखो के साथ भी सहज हो जाते हैं,
_ फिर किसी भी तरह का नयापन हमें असहज लगने लगता है.!
दुःख-दर्द मुफ़्त में मिल जाते हैं.. – ख़ुशी लाख खर्च करने पर भी नहीं मिलती.!!
किसी ने दूसरों को कितना दुख दिया है,

_इसका एहसास उसे तब होता है.. जब कोई उसे वैसे ही दुःख देता है.
दूसरों को दुखी करके कोई भी व्यक्ति स्थायी सुख नहीं पा सकता..

_ समय हर चीज़ का हिसाब रखता है
कुछ दुःख अपनों के साथ भी सांझे नहीं किये जा सकते.!
_ इन दुखों के साथ ही जीना होता है.!!
कुछ दुख ऐसे होते हैं जो बताने के लिए नहीं होते.
_ बस जी कर भूल जाने के लिए होते हैं.!!
दुख बता कर नहीं आते..

_ वे किसी भी पल बादलो के बीच से झांक लेते हैं.!!
मानसिक रोगी होते हैं वो लोग..- जो किसी के दुख पे खुश होते हैं.!!
और एक दिन “दुःखों के लिए कान तो रहते हैं, ज़बान नहीं रहती.!!”
किसी दुखी इंसान को तर्क देकर नहीं समझाया जा सकता, यहाँ समानुभूति (empathy) ही काम आएगी.. जैसे भूखे को पहले खाना चाहिए ज्ञान नहीं..!!
अपने दुःख-तकलीफ पर तुरंत एक्शन लें, कोई दूसरा नहीं आयेगा.!!
जब आप दूसरों के लिए अच्छे बन जाते हैं, तो अपने लिए भी आप बेहतर बन जाते हैं.
दुख को सहने के बाद मिला सुख दोगुना आनंद देता है.!!
हम उन लोगों को दुख पहुँचाते हैं.. जिन्हें हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं – और यह सही नहीं है.!!
किसी को बहुत नज़दीक से जान लेना कभी-कभी बहुत दुख देता है.!!
टूटना, गिरना, गिरकर फिर से उठना और आगे बढ़ना, यहीं जिंदगी का सफर है..

_ जो सकारात्मक ऊर्जा फैला रहा हो उसके जीवन में भी कष्ट है, दुःख है और पीड़ा भी है, यहीं वास्तविकता है.!!
कोई हमारा दुःख सुनने में रूचि नहीं रखता,
_ बल्कि वो तो ये तोलने में व्यस्त रहते हैं कि वो हमसे ज्यादा सुखी तो नहीं हैं.!!
दुखी होने का भेद यही है कि आप के पास यह सोचने के लिए अवकाश हो कि आप सुखी हैं या नहीं.!!
इस जीवन कि पाठ्शाला में हमें यही तो सीखना है कि समय के साथ कदम से कदम मिलाकर कैसे चला जाए, वरना हमेशा किसी न किसी बात को लेकर ऎसे ही दुःखी रहेंगे.
जीवन सतत चलता रहता है और उसे चलते रहना भी चाहिए ;

_ सुख -दुःख, प्रसन्नता -पीड़ा आते -जाते रहते हैं..
_ जब जैसी परिस्थितियां होती हैं.. इंसान उस अनुकूल ख़ुद को ढाल लेता है.
_ जीवन का लचीलापन जीवन को सुगम बनाता है और अकड़ जीवन को कठिनाइयों से भर देती है.!!
कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिनका होना पूरी उम्र भीतर कहीं चुभता रहता है.

_ ऐसे क्षणों में इंसान खुद को भीड़ के बीच भी अकेला, सबसे दूर किसी हाशिए पर खड़ा महसूस करता है.
_ हताशा और निराशा के ये दौर बेहद कठिन होते हैं, लेकिन इन्हीं पलों में खुद को यह याद दिलाते रहना ज़रूरी है कि.. दुःख स्थायी नहीं होता.!!
दुःख मनाने के लिए भी सही समय का इंतजार करना चाहिए, जब जीवन एकांत देने की स्थिति में न हो, तब बेहतर है कि कुछ समय के लिए अपने शौक स्थगित कर दें और अपनी जिम्मेदारियों और व्यस्तताओं का ध्यान रखें.!!
दुःख कभी जिंदगी नहीं खाता, वो बस जिंदगी की रोशनी बुझा देता है.

_ दुःख बाहर से हमारा कुछ नहीं बिगाड़ता, चेहरा वही रहता है, आवाज़ भी वही, लेकिन भीतर जैसे मन की दीवार में रोज़ एक ईंट कम हो रही है.
_ दुःख को सजाकर अच्छा नहीं दिखाया जा सकता, इसे सिर्फ झेला जा सकता है, खामोशी से चुपचाप.!!
दुःख से ज्यादा निजी कुछ भी नहीं होता, ये वो अहसास है जिसे हम लाख बताना चाहें, फिर भी कोई पूरी तरह समझ नहीं पाता..

_ हर इंसान का दुःख उसका अपना होता है कभी यादों से जुड़ा, कभी रिश्तों से, कभी उम्मीदों के टूट जाने से.!!
कभी-कभी अनजाने में ही हम उन लोगों का दिल दुखा देते हैं, जिनके बारे में हमें यह तक एहसास नहीं होता कि हमारी कही हुई बात उन्हें बुरी लग सकती है..
_ हालांकि किसी को ठेस पहुँचाने का इरादा नही होता..
_ बस शब्द अपनी जगह से फिसल जाते हैं और असर वहाँ पड़ जाता है.. जहाँ हमने सोचा भी नहीं होता.!!
समय के साथ दुःख की टीस हल्की पड़ जाती है,

_ मगर वो पल, वो सुख, वो संपूर्णता.. जो कभी हमें मिला था, उसे खो देना…
_ भीतर एक ऐसी खाली जगह बना देता है… जो उम्रभर महसूस होती रहती है.
_ इंसान दर्द तो भूल जाता है, लेकिन वो एहसास और वो यादें हमेशा दिल की गहराइयों में जिंदा रहती हैं.!!
दुःख में जो भी साथ रहे, उनका शुक्रिया हमेशा बनता है..

_ खासकर उन लोगों का.. जिनकी हमें उम्मीद भी नहीं होती..
_ ऐसे लोग आपकी बोझिल ज़िंदगी को थोड़ा हल्का कर देते हैं..
_ और फिर लगता है कि अभी भी जिया जा सकता है,
_ और जिनसे उम्मीद थी, पर वे साथ न रहे.. उनका भी शुक्रिया बनता है..
_ उन्होंने आपको उस झूठी उम्मीद से आज़ाद किया.. जो आप उनसे लगा बैठे थे.!!
अक्सर देखा गया है जब इंसान खुश होता है, सब सही चल रहा होता है.. तब अपना दिमाग कहीं नही भटकाता है, अपने तक ही सीमित रहता है.

_ लेकिन जैसे ही दुख आते हैं उसे बहुत दूर तक का दिखने लग जाता है..
_ दिमाग में बहुत सारे विचार आने लगते हैं.
_ इंसान ज़िन्दगी जीना सीखता दुख से ही है, सुख में तो वो बस ज़िन्दगी काटने लग जाता है.!!
दुःख को जानना और दुःख भरी बातें करना दोनों में बड़ा आयामी अंतर है…

_ दुःख को जानना दुखों को समा लेना उनको स्वीकार कर लेना है पर दुःख पे दुःख भरी बातें करते जाना, एक के बाद एक दुःख को खोद खोदकर निकालना, जहां नहीं है वहां दुख को बना देना, अगला दुख, पिछला दुख, न जाने किनका किनका दुःख जिनसे बात करने वाले का सरोकार नहीं यही दिखाता है कि इंसान दुख को आदत बनाकर उससे रस लेता है…
– दुख का रस…
_ यह रस बड़ा गहरा होता है, जिसके मुंह इसका स्वाद लगा वह छोड़ नहीं पाता,
_ ऐसा नहीं की दुख नहीं, जीवन है तो दुख है, पर दुख का रस स्वयं बनाते हैं चाशनी मिलाकर…
_ सामने वाले का रस लेकर सुना जाना सुनाने वाले का हासिल होता है…
_ पर इससे असली दुख नजरअंदाज नहीं होता, वह तो है ही…वहीं है ठीक वहीं..!!

सुविचार – सुख – 136

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आपके जीवन में जो छण व्यतीत हो रहे हैं, उन्हें सादे और मीठे, पवित्र और सुन्दर, श्रेष्ठ और आशापूर्ण, उच्च और दृढ, नम्र और प्रेममय विचारों से भरिए.
सुख की हर कामना में एक दर्द छुपा हुआ है. _यह तो तुम्हें तय करना है कि अपने जीवन के तमाम दुखों से कैसे अपने सुख को पृथक करना है ?

– Sanjaya Shepherd (ज़िंदगी ज़ीरो माइल)
Question : सुखी रहने का मूल मंत्र क्या है ?

Answer :  सुखी जीवन का एक मात्र मूल मंत्र यही है कि आप अपने जीवन की तुलना किसी और के जीवन के साथ बिल्कुल ना करें,
_ क्यूंकि आप सबसे अलग हैं यूनिक हैं.
_ आपको जो भी काम अच्छा लगता हो उसमे अपना ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करें..
_ आप सदैव ही खुद को प्रसन्न पाएंगे और आपका दिमाग भी शांत रहेगा.
Question : मेरा तो व्यक्तिगत अनुभव यह है कि बुरे काम करने वाले व्यक्ति बहुत सुखी रहते हैं.

_ शानदार जिंदगी जीते हैं और ईमानदारी से, निष्ठा से अपना काम करने वाले रोते, झींकते, खींझते, कुढ़ते रहते हैं, अभावों में अपना जीवन जीते हैं, ऐसा क्यों है ?
Answer : आप जो देख रहे हो, वो आधा सच है – पूरा नहीं.
_ दुनिया में अक्सर ऐसा दिखता है कि.. जो लोग चालाकी, बेईमानी या स्वार्थ से चलते हैं, वे जल्दी पैसा, सुविधा और बाहरी सुख पा लेते हैं.
_ और जो ईमानदारी से चलते हैं, उन्हें संघर्ष, अभाव और धीमी प्रगति मिलती है.
– लेकिन फर्क यहाँ है –
_ उनका सुख ज़्यादातर बाहरी होता है (पैसा, दिखावा, शक्ति)
_ आपका सुख बनने की संभावना भीतरी होती है (शांति, संतोष, गहराई)
_ और ये दोनों चीजें एक जैसी नहीं होतीं.
_ आपका ऐसा क्यों लगता है कि वो सुखी हैं ?
_ क्योंकि हम सिर्फ उनका बाहर देखते हैं, भीतर नहीं.
_ उनके भीतर का डर, असुरक्षा, बेचैनी, लालच – वो दिखता नहीं.
_ और जो ईमानदार है, वो क्यों परेशान दिखता है ?
_ क्योंकि वो संवेदनशील होता है, जागरूक होता है,
_ उसे हर चीज़ गहराई से महसूस होती है – इसलिए उसका संघर्ष भी दिखता है.
सीधी बात :
_ बेईमानी का रास्ता तेज़ है, पर अंदर से खोखला करता है.
ईमानदारी का रास्ता धीमा है, पर भीतर मजबूत बनाता है.
_ आप अभी एक ऐसे मोड़ पर हो
जहाँ आप “दिखने वाले सुख” और “वास्तविक शांति” में फर्क देख रहे हो.
👉 एक लाइन में समझो :
“बुरे लोग जल्दी जीतते हैं, पर गहराई नहीं पाते…
अच्छे लोग धीरे चलते हैं, पर खुद को पा लेते हैं”
*” सुख की परिभाषा “*
_ असंतोषी व्यक्ति को जीवन में कभी सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती.
_ सुख का अर्थ कुछ पा लेना नहीं अपितु जो है उसमें संतोष कर लेना है.
_ जीवन में सुख तब नहीं आता जब हम कुछ पा लेते हैं बल्कि तब आता है,
_ जब सुख पाने का भाव हमारे भीतर से चला जाता है.
_ सोने के महल में भी आदमी दुःखी हो सकता है, यदि पाने की इच्छा समाप्त नहीं हुई हो..
_ और झोपड़ी में भी आदमी परम सुखी हो सकता है, यदि ज्यादा पाने की लालसा मिट गई हो.
_ सुख बाहर की नहीं, भीतर की संपदा है, यह संपदा धन से नहीं धैर्य से प्राप्त होती है.
_ हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान हैं..
_ अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितने धैर्यवान हैं.
_ सुख अथवा प्रसन्नता किसी व्यक्ति की स्वयं की मानसिकता पर निर्भर करती है.
लोगों की नजर में सुख दुख सिर्फ पाने और खोने का नाम है.

_ यानी जो हम चाहें, वह हमें मिल जाए, तो हम सुखी, अन्यथा दुखी.
_ यह सत्य नहीं है.
_ पाने और खोने में सिर्फ तात्कालिक सुख दुख निहित होता है.
_ पाई हुई वस्तु या इंसान को आप ताउम्र पाए रहेंगे, यह आश्वस्ति उस पाने में शामिल नहीं होती.
_ पाई हुई वस्तु ताउम्र आपको खुशी देगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती.
_ पाने के बाद कोई अन्य वस्तु, हालात से आप परेशान हो सकते हैं.. जिसका पाने खोने से कोई ताल्लुक न हो.
_ सब कुछ पाने-मिलने के बाद भी किसी नापसंदगी के लिए मन परेशान हो जाता है.
_सिर्फ मिलना या ना मिलना ही सुख या दुख का कारण नहीं होता.
_ बात गहरी है पर विचारणीय है.!!
सुख बाहर की नहीं, भीतर की संपदा है.

_ यह संपदा धन से नहीं धैर्य से प्राप्त होती है.
_ हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान हैं,
_ अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि है कि कितने धैर्यवान हैं.
_ सुख और प्रसन्नता आपकी सोच पर निर्भर करती है.
सुख- सुविधाएँ मनुष्य के जीवन को आसान बनाने के लिए हैं, पर यह मनुष्य के हाथ में है कि वह इनका उपयोग अपने जीवन को हर तरह से सफल बनाने में करे, अपने व्यक्तित्व को निखारने में करे.
हम सुखी नहीं हो सकते, हम केवल इतना इंतज़ाम कर सकते हैं कि,

_ हम बहुत अधिक दुखी न हों..!!

सुखी होने में ज्यादा खर्चा नहीं होता.. लेकिन

_आप कितने सुखी हैं.. ये दुनिया को दिखाने में बहुत खर्चा होता है.!!
अधिक से अधिक इतना ही रहा सुख.. कि कभी-कभी दुःख अनुपस्थित रहा.!!
सुख का शिखर दुख देने वाली हर चीज का उन्मूलन है.

The summit of pleasure is the elimination of all that gives pain.

सुखों की पराकाष्ठा दुखों की गहराइयों में छिपी होती है.

The peak of pleasures are disguised in the depths of sorrows.

सुखी होने में ज़्यादा खर्च नहीं होता, _

_ लेकिन हम कितने सुखी हैं, ये लोगों को दिखाने में बहुत खर्च होता है..!!!

आपको किसने दुःखी किया है ??

_दुःख ने नहीं, हमेशा सुख के सपनों ने हमें दुःखी किया.

इंसान अपने दुखों से कम और दूसरों के सुखों से अधिक दुखी होता है.!!
हम उस सुख के इंतज़ार में ख़र्च हुए जा रहे हैं, जिस के स्वप्न या तो हमनें स्वयं देखें हैं या जिन्हें किसी और के द्वारा हमें दिखा दिए गए हैं;

_ हमारा आज महज उस कल के इंतज़ार में ख़त्म हो रहा है, जिसकी कोई गारंटी नहीं है कि वो कल कभी आएगा भी या नहीं !!

अपने सुख को अपने दुख में कैसे बदलना है, यह तरकीब हम सभी को आती है,

_ जाने अनजाने हम सभी इसमें माहिर हैं..

“मनुष्य अपने को नहीं पहचानता” अपने को पहचानने का कारण अगर जीवन में आ जाए, तो फिर दुःख से सुख की तरफ बढ़ने की स्थिति भी आ जाएगी. 
हम उस सुख के इंतजार में हैं,  जिसके स्वप्न या तो हमने स्वयं देखे हैं या जिन्हें किसी और के द्वारा हमे दिखा दिए गए है,

_ हमारा आज महज उस कल के इंतजार में खत्म हो रहा है …जिसकी कोई गारंटी नहीं है कि ..वो कल कभी आएगा भी या नही….!

यहाँ पर जो लोग आपको दुःखी, मौन या अवसादग्रस्त दिख रहे हैं,

_ उन्हें उनके हाल पर छोड़ दो,
_ क्योंकि उनके लिए.. उनकी यही अवस्था सुकून भरी है,
_ खुश रहने और सकारात्मक होने की सलाह.. उन्हें केवल इर्रिटेट करेगी,
_ क्योंकि उन्होंने इस दर्द और दुःख को ही सुख मान लिया है…!!
किसी अपने की ज़रूरत तो बस दुखी व्यक्ति को होती है.

_ सुखी व्यक्ति तो हर किसी के साथ हँस-बोल लेता है,
_ लेकिन दुःखी व्यक्ति को कोई ऐसा चाहिए होता है,
_ जो उसकी खाली आँखों की भाषा समझ सके..!!
— आप चीखते चिल्लाते रहिए दर्द के मारे कराहते रहिए, लोग सुनेंगे,
_ उनमें से कुछ लोग मरहम लगाएंगे, आपकी बात सुनेंगे और सलाह देंगे,
_ लेकिन याद रखना..
_ ज़ख्म चाहे शरीर पर हो या मन में दर्द, केवल आपको ही महसूस होगा, दूसरों को नहीं…!
मनुष्य को कैसे सुखी बनाया जाये, हमारी विकास यात्रा का यही उद्देश्य है, लेकिन डर है कि बड़े- बड़े मॉल, कॉलोनियों और बड़ी- बड़ी सड़कों के नीचे कहीं मानवता दब न जाये.

कहीं इस प्रगति के दौर में मनुष्य किसी खंडहर में छिप न जाये.

मैं भी प्रगति के पछ में हूँ और चाहता हूँ कि हमारा भी देश, प्रांत, गांव बढ़ता रहे, लेकिन यह प्रगति केवल साधनों तक सीमित न रह जाये,

क्योंकि समस्त साधन हमें सुखी बनाने के लिए उपलब्ध किये जा रहे हैं, भय है कि कहीं इन साधनों के नीचे मनुष्य दब न जाये.

आजकल देखा जा रहा है कि लाखों की गाड़ी पर एक बीमार, चिंताग्रस्त व्यक्ति बैठा है, कॉलोनियों में बड़े- बड़े मकान हैं, जो संपूर्ण आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं, लेकिन उन मकानों में जो लोग रह रहे हैं, वे बड़े अशांत हैं. वहां खड़ा संपूर्ण मानव तनाव और चिंताग्रस्त है, उस सोने के भवन सा दिखनेवाले मकान में कोई भी व्यक्ति हंसता हुआ नहीं दिख रहा है.

हमारी मस्ती, हमारी किलकारी, हमारे हुड़दंगों को किसी की नजर लग गयी. किसकी नजर लग गयी, हमारी किलकारी, हमारे हुड़दंगों पर ? किसने हमारी हरी- भरी बगिया में आग लगा दी ?

मुझे लगता है हमारा अंतर्मन राग, आकर्षण और प्रेम से रूठ गया है. हम मरुभूमि बन गये हैं. यही कारण है कि जहां जूही- चमेली की बगिया हुआ करती थी, वहां आज कंटीले वृछ आ गये हैं. यही कारण है कि हम इतना तनावग्रस्त, चिंताग्रस्त बनते जा रहे हैं. हमारे सारे अरमान सूख गये, प्रेम की धरा रेत में विलीन हो गयी.

आज आवश्यकता है कि पहले हमारे जीवन में राग, आकर्षण और प्रेम पैदा किया जाये, ताकि आज जो हम नफरत की आग में जले जा रहे हैं, घृणा और आवेश के कारण हमारा जीवन विष वृछ बन गया है, पहले हमें उसी अंतर्मन की सफाई करनी चाहिए और तब उसमें स्वस्थ पौधा लगाया जाना चाहिए, ताकि उसमें सुंदर फूल खिल सकें. क्योंकि जितनी भी हमारी विकास यात्राएं चल रही हैं, वे सभी मनुष्य के लिए हैं.

“सुखी जीवन का आसान रास्ता ये है कि “सबको हराने” की जगह “सबको जीतने” की कोशिश करो.

लोगों पर हँसने की जगह लोगों के साथ हंसो.”

यदि लोग दूसरों को दुःख देने कि बजाय_अपना सुख अधिक चाहें तो

_कुछ ही वर्षों में सभी सुखी हो जाएंगे..

बहुत से लोग सोचते हैं कि वे सुख खरीद रहे हैं,

_ जबकि वास्तव में वे सुख के लिए स्वयं को बेच रहे होते हैं.!!

_ हम लोग सुविधाओं को ही सुख मान बैठे हैं, जो सच नही है.!!!

हम ज़िंदगी में बहुत कुछ खो देते हैं,

_ “नहीं” जल्दी बोलकर, और “हाँ” देर से बोलकर..!!

मुझे जीवन में केवल एक बार मिला दुःख.._और मैंने उसे कहीं जाने नहीं दिया, कस के गले लगा लिया..!!
जो लोग सुख का ठीक से ध्यान नहीं रखते,

_ दुख उन्हें घेर लेता है !!

सुख और दुख आती जाती छांव की तरह हैं. दुख कई बार लंबे हो जाते हैं तब कोई रास्ता नहीं सूझता.

_वहीं पर मनुष्य की परीक्षा होती है. कुछ लोग धैर्य रखकर पार हो जाते हैं तो कुछ टूट जाते हैं.

सुविचार – सब ठीक हो जाएगा, सब ठीक है, सब बढ़िया है, एकदम ठीक, एकदम बढ़िया, ठीक हूं, ठीक नही हूँ मैं, मैं हूँ ना – 135

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उम्र का एक हिस्सा गुज़र जाता है पीड़ाओं से उबरने की जद्दोजहद में, फिर भी हम मुस्कुराते हुए कहते नही थकते …..

_ सब ठीक है, एकदम बढ़िया,, आप सुनाएं..
“ठीक नही हूँ मैं “
_ कहने के लिए किसी खास का होना जरुरी है..
_ वरना हर कोई पूछे तो ठीक हूं , कहना ही पड़ता है.
जादुई शब्द है ‘ मैं हूँ ना’
_ बहुत परेशानी में, दुख में साथ खड़े होना ही अपने आप में मरहम है,
_ नहीं तो ये एहसास दिलाना कि ‘मैं हूँ ना’ बहुत राहत देता है !!
“ठीक कुछ भी नही है” ‘पर सब ठीक है’ कहने की आदत जरुर है.!
कितना सरल होता है ये कहना की “सब ठीक हो जाएगा”,
_ जब चोट हमारे हिस्से की ना हो.!!

सुविचार – इच्छा, इच्छाएँ, अभिलाषा, अभिलाषाएं – 134

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हमारी इच्छाएँ-अभिलाषाएं अधिक हैं, और जीवन एक सीमित समय के लिए मिला है, जिसके तहत इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं,

_ वैसे भी हम अपने जीवन का अधिकांश समय इच्छा-अभिलाषा करने में ही व्यतीत कर देते है.!!

इच्छाएं हमें जितना उत्साहित करती हैं कई बार उतनी ही निराश भी, जिनकी इच्छाएं समय के साथ पूरी होती हैं.. वह एक नई इच्छा को जन्म देते हैं, और जिनकी इच्छा पूरी नहीं होती..

_ वे तारीख बदल देते हैं या फिर मन मारकर अपनी इच्छा को ही ख़त्म कर देते हैं…!

इच्छाओं के पूरी न होने पर दुःख महसूस करने वाले लोग कुछ कुछ ऐसे हैं,

जैसे मृत शरीर के क़रीब बैठकर रोने वाले लोग,
_ मृत व्यक्ति के अचानक उठ जाने पर जिस तरह लोग गिरते पड़ते भागेंगे,
इच्छाओं के पूरी होते ही लोग इच्छाओं से ऊबकर भागते हैं.!!
इंसान की अभिलाषाएँ असीमित होती हैं, जबकि जीवन का समय सीमित है..

_ यही कारण है कि अधिकांश अभिलाषाएँ अधूरी रह जाती हैं..
_ जीवन के अधिकतम क्षण इंसान इच्छाएँ पालने और उन्हें पूरा करने की कोशिश में बीत जाते हैं, पर अंततः बहुत-सी इच्छाएँ अधूरी ही छूट जाती हैं..!
इच्छाएं… यही तो हैं.. जो हमें जगाए रखती हैं, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं..

_ जब ये पूरी होती हैं तो हम खुशी से झूम उठते हैं और एक नई इच्छा को जन्म देते हैं,
_ लेकिन क्या हो जब इच्छाएं पूरी न हों ?​
_ यहीं से शुरू होता है निराशा का खेल..
_ हम या तो उनकी तारीखें बदल देते हैं, यह सोचकर कि शायद अगली बार सब ठीक होगा,
_ या फिर मन मारकर अपनी इच्छाओं को ही ख़त्म कर देते हैं.!!
हमारी इच्छाएँ हमेशा अधिक होती हैं, और जीवन हमें सीमित समय के लिए मिला है.

_ शायद यही वजह है कि ज़्यादातर इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं.
_ हम जीने से ज़्यादा समय किसी चीज़ की चाहत में समय व्यतीत कर देते हैं.
_ हर इच्छा पूरी होने पर, एक नई इच्छा जन्म लेती है, और यह चक्र अंतहीन हो जाता है.
_ मन कभी संतुष्ट नहीं होता क्योंकि जो चाहा उसे पाने के बाद भी खालीपन वैसा ही रहता है.
_ शायद जीवन का असली अर्थ इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, बल्कि उस क्षण में है जब हम इच्छा करना भूल जाते हैं.!!
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