प्रेम से इतने भर जाएँ कि शरीर के सारे संघर्ष समाप्त हो जाएँ। साथ ही अपने शरीर को • इन सद्भावना से भर दें कि जीवन में समृद्धि, स्वास्थ्य, सकारात्मकता, प्रेम, आनंद, मौन है तो और बढ़े.
हम हानि व कष्ट होने पर कुछ गवां ज़रूर देते हैं किन्तु उनसे शिक्षा लेते हुए ही हमें भविष्य का खाका खींचते हुए योजनाएं बनानी होंगी, ताकि वैसी हानिकारक एवं कष्टदायक घटनाओं की जीवन में पुनरावृत्ति न हो.
आजकल सब कुछ सेट होने के बावजूद भी लगभग हम सभी अपसेट से ही रहते हैं. हर समय दिमाग़ में चिन्ता ही चल रही होती है. इसलिए हम निराश और हताश ज्यादा होते हैं.
जो हमें सहज मे मिलता है वह दूध के समान होता है और जो माँगने से मिलता है वह पानी के समान. लेकिन जो कलह करके, मनमुटाव करके ज़बरदस्ती हासिल किया जाता है वह तो रक्त के समान होता है.
जो खो गया है हमें उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए बल्कि जो है उसका भरपूर आनंद लेना चाहिए. यदि हमारे दो दांत टूट भी गए तो क्या हुआ? बाकी तीस तो हैं. हम उन दो की याद में शेष को दरकिनार क्यों करें ?