मस्त विचार 4739
मैं सोच में हूँ के वक़्त के धागों से क़्या करूँ,
ख़्वाब बुनूँ या ख़्वाहिशें रफ़ू करूँ..
ख़्वाब बुनूँ या ख़्वाहिशें रफ़ू करूँ..
अब ना जाने कितने टुकड़ों में बट गया हूं मैं !
उनका अनुभव करो_ क्योंकि वे आपको ऊंचा उठाने आए हैं…
और कुछ अपने ऐसे मिले जो गैर का मतलब समझा गए.