मस्त विचार 2994
वो बिल्कुल ठीक है अपनी जगह,
बस हम ही जरुरत से ज्यादा उम्मीद कर बैठे थे उनसे.
बस हम ही जरुरत से ज्यादा उम्मीद कर बैठे थे उनसे.
_तो जूठे बर्तन धोना भी उसे फूल चुनने जैसा लगने लगता है.
जो पहले से जल रहा है उसे और क्या जलाना..
यूं ही हम लाजवाब नहीं हुए साहिब !
ये मत सोचिए – ? घर किसका रोशन हुआ.
मैं भीड़ नहीं हूँ दुनिया की, मेरे अंदर ही एक जमाना है…!