Quotes by Ishq Banaras

हर तरफ भाग-दौड़ देख रहा हूं, मानों हर किसी ने अपने वर्तमान को गिरवी रख दिया है सिर्फ उस भविष्य के लिए जिसके बारे में कोई भी निश्चित नहीं है.

_ कितनी अजीब बात है कि लोग कल के लिए जीते हैं और आज को ऐसे कुचल डालते हैं जैसे उसकी कोई कीमत ही न हो.

_ जबकि सच यही है कि कौन जाने कल किसका होगा, कौन जिंदा रहेगा और कौन सिर्फ याद बन जाएगा.

_ भविष्य की चिंता में खोए लोग अक्सर वर्तमान के छोटे-छोटे सुख गंवा देते हैं.

_ उनकी आँखों में सिर्फ एक दौड़ होती है जमा करने की, पाने की, सुरक्षित कर लेने की.

_ पर ये सब जमा करके किसके लिए ? किस काम का ?

_ जब आज ही जीने की फुर्सत न मिले, तो कल का खजाना किस काम आएगा ?

_ मुझे लगता है, जो लोग वर्तमान की साँसों को दबाकर भविष्य की थैलियाँ भरने में लगे रहते हैं, वे सबसे बड़े मूर्ख हैं.

_ क्योंकि वे न इस पल के रहते हैं न अगले पल के.

_ जैसे एक प्यासा आदमी जो पानी से भरा घड़ा देखकर भी मर जाए, क्योंकि उसने कभी एक घूंट पीने की फुर्सत ही नहीं निकाली.

_ असल में जीना तो आज है. कल का कोई भरोसा नहीं.

_ लेकिन अफसोस, ये सबसे सरल बात समझने में सबसे कठिन लगती है.

– Ishq Banaras

हम सब शायद अपनी-अपनी ज़िंदगी में कुछ ऐसे दर्द लेकर चल रहे हैं, जिनका ज़िक्र किसी से नहीं करते.

_ चेहरे पर मुस्कान रहती है, आवाज़ में सामान्य होने का अभिनय रहता है और हम दुनिया को यकीन दिलाते रहते हैं कि सब ठीक है.

_ मगर सच तो यह है कि हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी हो सकती है, जिसे सुनने वाला शायद ही कोई हो.

_ कुछ दर्द शब्दों में कहे नहीं जाते, बस आँखों में उतर जाते हैं और इंसान उन्हें उम्र भर अपने भीतर लिए घूमता रहता है.

_ मैं अक्सर सोचता हूँ कि आखिर हम उम्मीदों से इतने थक क्यों गए हैं ?

_ शायद इसलिए कि उम्मीद जितनी खूबसूरत होती है, उसके टूटने की आवाज़ उतनी ही गहरी होती है.

_ हम हर बार सोचते हैं—कल बेहतर होगा, कोई हमें समझेगा, कोई लौट आएगा, हालात बदलेंगे, जिंदगी फिर मुस्कुराएगी.

_ लेकिन जब बार-बार हमारी उम्मीदें खाली हाथ लौटती हैं, तो धीरे-धीरे मन किसी चीज़ की प्रतीक्षा करना छोड़ देता है.

_ फिर इंसान दुखी कम और उदासीन ज्यादा हो जाता है ; उसे खुशी की चाह भी डराने लगती है, क्योंकि वह जानता है कि हर उम्मीद के पीछे टूटने का एक डर छिपा है.

_ दिन गुजरते रहते हैं.

_ वही जिम्मेदारियाँ, वही भागदौड़, वही चेहरे और वही औपचारिक बातचीत.

_ हम हँसते हैं, दूसरों की बातें सुनते हैं, उनकी परेशानियों में उनका साथ देते हैं और फिर अपनी परेशानियों को लेकर चुपचाप घर लौट आते हैं.

_ अजीब बात है न—हम दूसरों के आँसू पहचान लेते हैं, लेकिन अपनी आँखों की नमी छुपाने में पूरी उम्र लगा देते हैं.

_ शायद इसलिए कि हमें बचपन से सिखाया गया कि मजबूत बनो, मगर किसी ने यह नहीं बताया कि मजबूत होने का मतलब हर दर्द को अकेले सहना नहीं होता.

_ सबसे मुश्किल वक्त अक्सर रात का होता है.

_ दिन के शोर में इंसान खुद से बचा रहता है, लेकिन रात जब कमरे की दीवारों पर सन्नाटा उतरता है, तब भीतर दबे हुए सारे सवाल जाग जाते हैं.

_ पुरानी बातें याद आती हैं, अधूरे रिश्ते सामने आ खड़े होते हैं, कुछ चेहरे बिना बुलाए आँखों में उतर आते हैं और मन पूछता है—आखिर इतना सब सहकर भी हम किस चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं ?

_ कितनी बार मन करता है कि किसी के सामने बैठकर सब कह दें, बिना कुछ छुपाए, बिना मजबूत बनने का अभिनय किए.

_ लेकिन फिर डर लगता है कि कहीं सामने वाला हमारी कहानी सुनकर भी हमें समझ न पाए और तब शब्द गले में ही रह जाते हैं.

_ धीरे-धीरे इंसान अपने दर्द के साथ समझौता करना सीख लेता है.

_ मुस्कुराना उसकी आदत बन जाता है, चुप रहना उसका स्वभाव और अकेले सह लेना उसकी मजबूरी.

_ बाहर से देखने वाले को लगता है कि वह बहुत संभला हुआ है, मगर भीतर वह हर दिन खुद को थोड़ा-थोड़ा समेट रहा होता है.

_ कभी-कभी तो ऐसा भी लगता है कि सुकून कोई बहुत बड़ी चीज़ नहीं, बस कुछ पल ऐसे मिल जाएँ जहाँ मन को किसी बात का जवाब न देना पड़े, किसी रिश्ते को निभाना न पड़े और किसी के सामने अपने ठीक होने का प्रमाण न देना पड़े.

_ फिर भी जिंदगी पूरी तरह बेरहम नहीं होती.

_ कभी किसी पुराने गीत की धुन अचानक भीतर का कोई बंद दरवाज़ा खोल देती है.

_ किसी किताब की एक पंक्ति अपनेपन का एहसास करा देती है.

_ किसी पुराने मित्र का संदेश, किसी अपने की छोटी-सी चिंता या खिड़की से आती सुबह की हल्की रोशनी यह याद दिला देती है कि जिंदगी में अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है.

_ शायद सुकून हमेशा बड़ी खुशियों में नहीं मिलता ; कभी-कभी वह उन छोटे-छोटे पलों में छिपा होता है, जिन्हें हम अपनी व्यस्त जिंदगी में देखने से चूक जाते हैं.

_ हम अक्सर सोचते हैं कि दर्द कभी खत्म नहीं होगा.

_ लेकिन शायद हर दर्द का खत्म होना जरूरी भी नहीं होता.

_ कुछ दर्द हमें बदलने आते हैं, कुछ हमें रिश्तों की कीमत समझाने, कुछ हमें अपने भीतर झाँकना सिखाने और कुछ हमें यह बताने कि हम जितना खुद को कमजोर समझते हैं, उससे कहीं ज्यादा सहने की क्षमता हमारे भीतर है.

_ वक्त हर घाव को मिटा दे, यह जरूरी नहीं ; मगर वह उसके साथ जीना जरूर सिखा देता है.

_ शायद जिंदगी का सच यही है कि हममें से कोई भी पूरी तरह बेदाग नहीं है.

_ हर किसी के भीतर कोई अधूरी कहानी है, कोई खोया हुआ रिश्ता है, कोई ऐसा वादा है जिसे निभाया नहीं जा सका, कोई ऐसा अपना है जिसे चाहकर भी रोक नहीं पाए और कोई ऐसा समय है जिसे चाहकर भी वापस नहीं ला सकते.

_ हम सब अपने-अपने हिस्से की खामोशी लिए इस दुनिया में चलते रहते हैं.

_ और शायद इसी का नाम जिंदगी है.

_ टूटकर भी बिखर न जाना, थककर भी अगली सुबह उठ जाना, आँखों में नमी होते हुए भी किसी और के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करना.

_ हम सब अपने भीतर कुछ ऐसा ढो रहे हैं, जिसका वजन दुनिया को दिखाई नहीं देता.

_ फिर भी कदम चलते रहते हैं, दिन गुजरते रहते हैं और उम्मीद की कोई बहुत छोटी-सी लौ कहीं भीतर जलती रहती है.

_ क्योंकि शायद जिंदगी का सबसे खूबसूरत सच यही है कि अँधेरा चाहे कितना भी लंबा क्यों न हो, मन के किसी कोने में सुबह के लौट आने की संभावना हमेशा बची रहती है.

_ बस हमें उस संभावना को पूरी तरह मरने नहीं देना चाहिए.

_ कभी-कभी खुद के लिए भी उतनी ही नरमी बचाकर रखनी चाहिए, जितनी हम दूसरों के दर्द के लिए रखते हैं.

_ हम सब अपने-अपने दर्द के साथ जी रहे हैं.. कोई उसे शब्द दे देता है, कोई आँसुओं में बहा देता है और कोई मुस्कुराकर छुपा लेता है.

_ मगर हर दिल के भीतर कहीं न कहीं एक छोटी-सी पुकार जरूर होती है.

_ कोई हमें भी समझ ले.. बिना कुछ पूछे, बिना कोई फैसला सुनाए.

_ शायद इंसान को हमेशा समाधान नहीं चाहिए होता, कभी-कभी उसे बस इतना चाहिए होता है कि कोई उसके पास बैठकर कह दे !

_ तुम्हें हर वक्त मजबूत बने रहने की जरूरत नहीं है.

– Ishq Banaras

कभी-कभी इस भीड़-भरी दुनिया में कुछ चेहरे ऐसे मिल जाते हैं जो किसी ऊँचाई, किसी प्रसिद्धि, किसी बड़ी जीत की दौड़ में नहीं हैं.

_ उनके जीवन की कोई चमकदार तमन्ना नहीं होती। न किसी मंच की ख्वाहिश, न किसी ताली की चाह.

_ वे बस चाहते हैं कि उनके भीतर जो कोई अनकहा दर्द पल रहा है, वो किसी तरह कम हो जाए.

_ उनकी आँखों में कोई सपनों का समंदर नहीं, बस थोड़ा सा सुकून है जो हर रात की नींद से पहले खोजते हैं.

_ उन्हें दुनिया से बहुत नहीं चाहिए, बस मन का वह बोझ थोड़ा हल्का हो जाए जो हर सुबह उनके कंधों पर चुपचाप चढ़ जाता है बिना पूछे, बिना बताए.

_ कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों की मुस्कान में अपने जीने का कारण ढूंढते हैं, पर खुद की मुस्कान कई बार भूल चुके होते हैं.

_ जिनकी आत्मा रोज़ किसी अनजाने अपराधबोध, किसी अधूरे रिश्ते, किसी भूले हुए वादे या खो चुके समय की टीस से बोझिल हो जाती है.

_ वे रोज मंदिर में नहीं जाते, लेकिन भीतर कोई प्रार्थना हर रात करवटें बदलती है कि एक दिन ऐसा आए जब उनकी आत्मा शांत हो जाए, कि कोई आँसू भीतर बहने से पहले ही किसी की हथेली में थम जाए, कि कोई चुप्पी बस एक बार समझ ली जाए बिना कहे.

_ वे लोग आखिरी विदा से नहीं डरते, बस यह चाहते हैं कि वह विदा सुकून में हो, शांति में हो, ऐसे कि नींद में कोई सोच न जागे, ऐसे कि मृत्यु से पहले जीवन कुछ हल्का लगे.

_ कई बार ऐसे लोग हमारे बहुत करीब होते हैं और हम उन्हें पहचान नहीं पाते, क्योंकि वे बोलते कम हैं, सहते ज़्यादा हैं. _ वे शोर नहीं करते, सिर्फ़ थक कर मुस्कुरा देते हैं.

_ और शायद इस समाज की सबसे बड़ी चूक यही है कि वह उन्हीं की ओर सबसे कम देखता है जो सबसे ज़्यादा थके हुए होते हैं.

– Ishq Banaras

एक उम्र, एक मोड़ ऐसा जरूर आता है, _ जब मन को यह समझाना पड़ता है कि हर उस इंसान के दिल में हमेशा अपनी जगह बनाए रखना संभव नहीं, जिसे हमने कभी अपना समझा था.

_ कुछ लोग हमारे जीवन में बहुत गहराई से आते हैं, हमारी आदतों, हमारी स्मृतियों और हमारी भावनाओं का हिस्सा बन जाते हैं,

_ इसलिए जब उनके भीतर हमारे लिए पहले जैसा अपनापन नहीं बचता, तो सबसे पहले हम खुद को कटघरे में खड़ा कर देते हैं.

_ सोचते हैं—हमसे कहाँ कमी रह गई, हमने क्या कम किया, ऐसा क्या बदल गया कि जो कभी इतने अपने थे, आज इतने दूर हो गए.

_ लेकिन शायद हर दूरी के पीछे कोई गलती नहीं होती.

_ कुछ रिश्ते बस अपने हिस्से की धूप लेकर आते हैं, थोड़ी देर हमारे साथ चलते हैं और फिर समय की किसी अनदेखी राह पर हमसे अलग हो जाते हैं.

_ यह स्वीकार करना कठिन है, मगर जीवन की कुछ सच्चाइयाँ ऐसी ही होती हैं—उन्हें समझने में देर लगती है, पर समझ आ जाएँ तो मन बहुत कुछ छोड़ देना सीख जाता है.

_ हम अक्सर अपने स्नेह को किसी स्थायी वचन की तरह जीते हैं.

_ किसी के लिए अपना समय बचाते हैं, उसकी खामोशियाँ पढ़ते हैं, उसकी परेशानियों में उसके साथ खड़े रहते हैं और मन ही मन मान लेते हैं कि इतनी सच्चाई, इतना अपनापन और इतना समर्पण शायद हमें उसके जीवन में हमेशा के लिए जगह दे देगा.

_ लेकिन रिश्ते केवल हमारे दिए हुए से नहीं चलते; उनमें सामने वाले का मन, उसकी परिस्थितियाँ, उसकी जरूरतें और उसकी बदलती प्राथमिकताएँ भी उतनी ही बड़ी भूमिका निभाती हैं.

_ कभी-कभी हम किसी के जीवन में बहुत जरूरी होते हैं, और फिर एक दिन बिना किसी घोषणा के हमारी जरूरत कम हो जाती है.

_ यही वह क्षण होता है जब हमें अपने प्रेम की कीमत नहीं, उसकी प्रकृति समझनी चाहिए.

_ किसी का बदल जाना हमेशा हमारे कम हो जाने का प्रमाण नहीं होता.

_ कई बार बस इतना होता है कि जिंदगी ने दोनों के रास्तों की दिशा बदल दी होती है.

_ और शायद यही मान लेना, अपने मन को सबसे बड़ी राहत देना है.

_ इस सत्य को देर से स्वीकार करने वाला मन सबसे ज़्यादा टूटता है.

_ वह हर बदलते व्यवहार में अपनी ही कमी खोजता है, हर दूरी को अपनी गलती मान लेता है.

_ वह स्वयं को साबित करने की थकाऊ दौड़ में लग जाता है, ये भूलकर कि प्रेम और अपनापन किसी प्रतियोगिता का परिणाम नहीं होते.

_ जितनी जल्दी ये समझ विकसित हो जाती है कि हर रिश्ता स्थायी नहीं होता, उतनी ही जल्दी मन अनावश्यक अपेक्षाओं से मुक्त होने लगता है.

_ किसी के जीवन से धीरे-धीरे बाहर हो जाना अपमान नहीं है, बल्कि समय का स्वाभाविक क्रम है.

_ लोग हमारे साथ अपनी ज़रूरत के मौसम तक चलते हैं.

_ जब मौसम बदलता है, रास्ते भी बदल जाते हैं.

_ इस बदलाव को स्वीकार न कर पाने से भीतर असंतोष, ईर्ष्या, और आत्मग्लानि जन्म लेती है.

_ जबकि स्वीकार कर लेने से मन में एक ठहराव आता है, एक शांति पैदा होती है कि जो गया, वह अपना काम पूरा कर चुका था.

_ खुद को हर हाल में प्रिय बनाए रखने की कोशिश सबसे बड़ा भावनात्मक बोझ है.

_ इससे व्यक्ति अपने स्वाभाविक स्वरूप को खो देता है, अपनी सीमाओं को अनदेखा करने लगता है.

_ वह अपनी ही तकलीफों को दबाकर दूसरों की स्वीकृति ढूँढता रहता है.

_ जबकि आत्म-सम्मान यही सिखाता है कि जहाँ अपनापन सहज न रहे, वहाँ ठहरना स्वयं के साथ अन्याय है.

_ ये स्वीकार करना कि आप किसी के केंद्र में नहीं हैं, आपको कमजोर नहीं बनाता बल्कि मजबूत करता है.

_ ये आपको सिखाता है कि भावनात्मक सुरक्षा बाहर नहीं, भीतर से आती है.

_ जब आप ये मान लेते हैं कि हर कोई आपके साथ नहीं रहेगा, तब आप उन रिश्तों को अधिक सच्चाई से जी पाते हैं जो वास्तव में मौजूद हैं.

_ तब आप कम लोगों से ही सही पर गहराई से जुड़ते हैं.

_ जीवन में सबसे बड़ा संतुलन यही है कि आप प्रेम करना बंद न करें, पर यह अपेक्षा भी न रखें कि प्रेम का उत्तर हमेशा समान रूप में मिलेगा.

_ किसी के प्रिय न रह जाना जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई समझ की शुरुआत है.

_ ये समझ आपको भावनात्मक चोटों से नहीं बचाती, पर आपको टूटने से जरूर बचा लेती है._ अंततः ये समझ लीजिए शांति उसी दिन आती है, जब आप ये मान लेते हैं कि आपका मूल्य किसी के स्वीकार या अस्वीकार से तय नहीं होता.

_ आप जैसे हैं, उतने ही पर्याप्त हैं.

_ जो लोग आपके जीवन में रहना चाहेंगे, वे बिना शर्त रहेंगे, और जो जाना चाहेंगे, उन्हें रोके रखना आपके सम्मान के विरुद्ध होगा.

_ इस सत्य को जितनी सहजता से स्वीकार कर लिया जाए, जीवन उतना ही हल्का, संतुलित और सच्चा हो जाता है.!!

-Ishq Banaras

एक उम्र के बाद धीरे-धीरे यह समझ आने लगता है कि हम हर किसी के लिए हमेशा उतने ही ख़ास नहीं रह सकते, जितने कभी हुआ करते थे.

_ कुछ रिश्ते वक़्त के साथ बदल जाते हैं, कुछ लोगों की प्राथमिकताएँ और कुछ के मन में हमारे लिए बची हुई जगह.

_ जो कभी हमारी आवाज़ सुनने के लिए बेचैन रहते थे, वे एक दिन हमारी ख़ामोशी को भी अनदेखा करने लगते हैं.

_ और सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है, जब हमें यह एहसास होता है कि जिसे हमने अपने जीवन का अहम हिस्सा माना, उसकी ज़िंदगी में हम धीरे-धीरे एक मामूली-सा हिस्सा बनकर रह गए.

_ दिल इस बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता, क्योंकि हम रिश्तों को केवल निभाते नहीं, उनमें अपनी भावनाएँ, अपनी उम्मीदें और अपने होने का एक हिस्सा भी छोड़ आते हैं.

_ हम अक्सर यह सोचकर किसी से जुड़ते हैं कि हमारा सच्चा अपनापन, हमारी परवाह और हमारा निस्वार्थ प्रेम एक दिन उसके दिल में हमारे लिए ऐसी जगह बना देगा, जिसे वक़्त भी नहीं बदल पाएगा.

_ हम उसकी ख़ुशी में ख़ुश होते हैं, उसके दुःख को अपना समझते हैं और कई बार अपनी परेशानियों को भी इसलिए छिपा लेते हैं, ताकि उसकी मुस्कान फीकी न पड़े.

_ हमें लगता है कि जिस रिश्ते में हमने इतना कुछ सच्चे मन से दिया है, वह रिश्ता हमें कभी पराया नहीं होने देगा.

_ लेकिन ज़िंदगी हमेशा हमारी भावनाओं के हिसाब से नहीं चलती.

_ कभी-कभी हम किसी के लिए उतना सब कुछ होते हैं, जितना वह उस वक़्त चाहता है, और फिर एक दिन उसकी ज़िंदगी बदलती है, उसकी ज़रूरतें बदलती हैं और हमारे लिए उसके भाव भी पहले जैसे नहीं रहते.

_ तब समझ आता है कि किसी को सच्चे दिल से चाहना हमारे हाथ में है, लेकिन उसके दिल में हमेशा वही जगह बनाए रखना हमारे हाथ में नहीं.

_ हम अक्सर ये मान बैठते हैं कि हमारा दिया हुआ समय, हमारी ईमानदारी, हमारा समर्पण किसी के जीवन में हमें स्थायी स्थान दिला देगा.

_ पर सच ये है कि किसी के प्रिय बने रहना हमारी योग्यता या नीयत पर नहीं, बल्कि सामने वाले की ज़रूरतों, मनःस्थिति और स्वार्थों पर भी निर्भर करता है.

_ जब तक आप किसी के लिए उपयोगी हैं, समझे जाते हैं ; और जिस दिन आपकी भूमिका बदल जाती है, उसी दिन भावनाएँ भी बदलने लगती हैं.

_ यह व्यक्तिगत असफलता नहीं है, यह मानवीय स्वभाव है.

_ इस बदलाव को स्वीकार करना आसान नहीं होता.

_ मन बार-बार बीते हुए दिनों में लौटता है, पुराने व्यवहार में आज के अपनापन को तलाशता है और उन सवालों के जवाब ढूँढ़ता रहता है, जिनका शायद कोई जवाब होता ही नहीं.

_ हम सोचते हैं कि आख़िर हमसे ऐसी क्या कमी रह गई, हमने कहाँ गलती की, हमारी कौन-सी बात बदल गई.

_ कभी-कभी तो हम सामने वाले के बदले हुए व्यवहार के लिए भी ख़ुद को ही ज़िम्मेदार मानने लगते हैं.

_ हम और अधिक समझने, और अधिक निभाने और ख़ुद को बार-बार साबित करने की कोशिश करते हैं, जबकि सच यह है कि हर बदलते रिश्ते के पीछे हमारी कोई गलती हो, यह ज़रूरी नहीं.

_ कुछ दूरियाँ किसी शिकायत से नहीं, वक़्त के साथ बदलती भावनाओं से पैदा होती हैं. _ और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें बचाने की कोशिश में हम ख़ुद से ही दूर होने लगते हैं.

_ किसी के जीवन से धीरे-धीरे बाहर हो जाना अपमान नहीं है, बल्कि समय का स्वाभाविक क्रम है.

_ लोग हमारे साथ अपनी ज़रूरत के मौसम तक चलते हैं.

_ जब मौसम बदलता है, रास्ते भी बदल जाते हैं.

_ इस बदलाव को स्वीकार न कर पाने से भीतर असंतोष, ईर्ष्या और आत्मग्लानि जन्म लेती है.

_ जबकि स्वीकार कर लेने से मन में एक ठहराव आता है, एक शांति पैदा होती है कि जो गया, वह अपना काम पूरा कर चुका था.

_ शायद जीवन की सबसे कठिन सीख यही है कि हर उस इंसान को रोकना ज़रूरी नहीं, जिसके जाने से हमारा दिल दुखता है.

_ कुछ लोगों को हम जितना भी समझ लें, वे हमें समझने की कोशिश नहीं करते.

_ कुछ रिश्तों में हम जितना भी अपना मन लगा लें, सामने वाला उतनी गहराई से जुड़ नहीं पाता.

_ ऐसे में बार-बार अपनी अहमियत याद दिलाना, अपने प्रेम का प्रमाण देना और अपने होने की वजह समझाना मन को भीतर तक थका देता है.

_ प्रेम वह जगह है, जहाँ इंसान को बार-बार यह साबित नहीं करना चाहिए कि वह भी मायने रखता है.

_ जहाँ हर बार अपने हिस्से का अपनापन माँगना पड़े, वहाँ एक दिन ख़ामोशी से ख़ुद को सँभाल लेना ही बेहतर होता है.

_ खुद को हर हाल में प्रिय बनाए रखने की कोशिश सबसे बड़ा भावनात्मक बोझ है.

_ इससे व्यक्ति अपने स्वाभाविक स्वरूप को खो देता है, अपनी सीमाओं को अनदेखा करने लगता है.

_ वह अपनी ही तकलीफ़ों को दबाकर दूसरों की स्वीकृति ढूँढ़ता रहता है.

_ जबकि आत्मसम्मान यही सिखाता है कि जहाँ अपनापन सहज न रहे, वहाँ ठहरना स्वयं के साथ अन्याय है.

_ इसका अर्थ यह नहीं कि हम लोगों से उम्मीद करना छोड़ दें, किसी से प्रेम न करें या रिश्तों से अपना विश्वास उठा लें.

_ इसका अर्थ केवल इतना है कि हम प्रेम करें, लेकिन ख़ुद को खोकर नहीं ;

_ किसी की परवाह करें, लेकिन अपनी भावनाओं को अनदेखा करके नहीं ;

_ किसी के साथ चलें, लेकिन इस डर में नहीं कि उसके बिना हमारा रास्ता अधूरा हो जाएगा.

_ रिश्ते जीवन को ख़ूबसूरत बनाते हैं, लेकिन हमारी पूरी ज़िंदगी केवल किसी एक रिश्ते के सहारे नहीं टिकी होती.

_ जब यह बात भीतर उतरने लगती है, तब हम दूसरों के बदलने से दुखी तो होते हैं, मगर उनके बदल जाने को अपनी कमी समझकर ख़ुद को सज़ा देना बंद कर देते हैं.

_ जीवन में सबसे बड़ा संतुलन यही है कि आप प्रेम करना बंद न करें, पर यह अपेक्षा भी न रखें कि प्रेम का उत्तर हमेशा समान रूप में मिलेगा.

_ किसी के प्रिय न रह जाना जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई समझ की शुरुआत है.

_ यह समझ हमें भावनात्मक चोटों से पूरी तरह नहीं बचाती, लेकिन इतना ज़रूर सिखा देती है कि हर चोट के बाद ख़ुद को समेटना है, हर दूरी के बाद अपनी अहमियत याद रखनी है और हर बिछड़ाव के बाद जीवन में आगे बढ़ने की गुंजाइश बनाए रखनी है.

_ आख़िरकार, शांति तब आने लगती है, जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हमारा मूल्य किसी के स्वीकार या अस्वीकार से तय नहीं होता.

_ किसी का हमें चाहना सुखद है, लेकिन किसी का हमें न चाह पाना हमारी अहमियत का अंत नहीं.

_ जो लोग हमारे जीवन में रहना चाहते हैं, वे अपने व्यवहार से अपने होने का एहसास कराते हैं.

_ और जिन्हें किसी और दिशा में आगे बढ़ना है, उन्हें रोकते रहने से न तो रिश्तों में पहले जैसा अपनापन लौटता है, न मन को वह सुकून मिलता है, जिसकी उसे तलाश होती है.

_ इसलिए किसी के बदल जाने पर अपने भीतर के प्रेम को ग़लत मत समझिए.

_ आपने किसी को सच्चे मन से चाहा, उसकी परवाह की और अपनी तरफ़ से रिश्ता निभाया, तो यह आपकी भावनाओं की सच्चाई है.

_ सामने वाला उसे समझ पाया या नहीं, यह अलग बात है.

_ हर अधूरा रिश्ता आपकी कमी की कहानी नहीं होता और हर बिछड़ाव आपकी हार नहीं होता.

_ कभी-कभी ज़िंदगी हमें उन लोगों से दूर करके नहीं, बल्कि उनके बिना जीना सिखाकर भी बहुत कुछ समझाती है.

_ धीरे-धीरे हम फिर से अपनी छोटी-छोटी ख़ुशियों में लौटने लगते हैं, अपने मन की सुनने लगते हैं और यह जानने लगते हैं कि सुकून केवल किसी के साथ होने में नहीं, अपने साथ सहज होने में भी है.

_ तब किसी की याद आती है, तो दिल उदास ज़रूर होता है, मगर हम अपनी पूरी दुनिया को उस याद के हवाले नहीं कर देते.

_ आख़िर में बस इतना याद रखिए कि हर किसी की ज़िंदगी में हमेशा ख़ास बने रहना संभव नहीं, लेकिन किसी के बदल जाने की वजह से ख़ुद की नज़रों में कम हो जाना भी ज़रूरी नहीं.

_ कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से चले जाते हैं, कुछ के मन में हमारी जगह बदल जाती है, मगर इन सबके बीच हमें ख़ुद का साथ नहीं छोड़ना चाहिए.

_ क्योंकि रिश्तों के बदलने का दुःख वक़्त के साथ हल्का पड़ सकता है, लेकिन ख़ुद को भुलाकर किसी की स्वीकृति पाने की कोशिश हमें भीतर से थका देती है.

_ इसलिए जो साथ हैं, उन्हें पूरे मन से सँभालिए ;

_ जो दूर हो रहे हैं, उन्हें समझने की कोशिश कीजिए.

_ और जहाँ बार-बार ख़ुद को साबित करना पड़े, वहाँ अपने मन को थोड़ा आराम दीजिए.

_ हर किसी के लिए प्रिय बने रहना ज़रूरी नहीं, अपने लिए सम्मान और सुकून बचाए रखना ज़रूरी है.!!

– Ishq Banaras

किसी को अपने जीवन में बनाए रखने की ज़िद को प्रेम समझ लेना, शायद मनुष्य की सबसे गहरी भावनात्मक भूल है.

_ प्रेम किसी के पैरों में बाँधी गई वह बेड़ी नहीं, जिसे कसकर हम उसके ठहरने का भरोसा कर लें.

_ प्रेम तो वह विश्वास है, जिसमें सामने वाले को पूरी आज़ादी देकर भी उसके लौट आने की उम्मीद से मन का एक कोना रोशन रहता है.

_ किसी का हाथ थामना प्रेम है, मगर उस हाथ को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेना मोह है.

_ जो रिश्ता बार-बार यह साबित करने की माँग करे कि तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगे, वहाँ प्रेम से अधिक खो देने की आशंका पल रही होती है.

_ क्योंकि जो मन से आपका है, उसे हर पल अपने होने का प्रमाण नहीं देना पड़ता, और जो मन से जा चुका है, उसे हज़ार वादों, हज़ार आँसुओं और हज़ार मिन्नतों से भी अपने पास नहीं रखा जा सकता.

_ इसलिए जब कोई आपके जीवन से जाने का निर्णय कर ले, तो उसके पीछे अपनी पूरी दुनिया लेकर मत भागिए.

_ किसी के लौट आने की प्रतीक्षा में अपने भीतर के उस इंसान को मत खो दीजिए, जो कभी हँसता था, सपने देखता था और छोटी-छोटी खुशियों में भी जीवन का अर्थ खोज लेता था.

_ याद रखिए, किसी के चले जाने से आपका प्रेम असफल नहीं हो जाता, न ही आपकी अहमियत कम हो जाती है.

_ कुछ लोग हमारे जीवन में साथ निभाने नहीं, हमें जीवन का कोई कठिन सत्य समझाने आते हैं.

_ उनके जाने का दुःख अपनी जगह है, लेकिन उस दुःख के कारण स्वयं से दूर हो जाना उससे भी बड़ी त्रासदी है.

_ किसी के लिए आँखें नम होना स्वाभाविक है, मगर उन्हीं आँखों में अपने भविष्य के सारे सपने बुझा देना ज़रूरी नहीं.

_ जो आपको छोड़कर चला गया, उसे जाने दीजिए.

_ अपने भीतर उस व्यक्ति को बचाकर रखिए, जिसने कभी पूरे विश्वास से प्रेम करना सीखा था.

_ जीवन में कभी-कभी हम किसी के लिए अपना समय, अपनी ऊर्जा, अपनी भावनाएँ, अपने सपने और अपना सर्वस्व तक समर्पित कर देते हैं.

_ हम उसके संघर्ष में साथ खड़े रहते हैं, उसके अंधेरों में दीपक बनते हैं, उसकी असफलताओं में सहारा बनते हैं.

_ लेकिन फिर एक दिन वही व्यक्ति सफलता की सीढ़ियाँ चढ़कर पीछे मुड़कर देखना भी आवश्यक नहीं समझता.

_ वह आगे बढ़ जाता है, और पीछे छूट जाता है वह इंसान जिसने उसकी यात्रा में अपना बहुत कुछ लगा दिया था.

_ ऐसी स्थिति में अधिकांश लोग टूट जाते हैं.

_ वे सोचते हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ है, उन्हें धोखा मिला है, उनकी निष्ठा का अपमान हुआ है.

_ यह पीड़ा स्वाभाविक है, लेकिन यदि थोड़ी गहराई से देखा जाए तो शायद यह कहानी उतनी दुखद नहीं, जितनी दिखाई देती है.

_ यदि किसी ने आपके समर्पण के बदले विश्वासघात चुना, तो उसने आपके चरित्र को छोटा नहीं किया, उसने अपने चरित्र का परिचय दिया है.

_ आपके द्वारा किया गया प्रेम, आपकी निष्ठा, आपका त्याग आज भी उतना ही पवित्र है, जितना उस दिन था जब आपने उसे निभाया था.

_ किसी दूसरे के कर्म आपकी अच्छाई को कम नहीं कर सकते. और सच मानिए, कभी-कभी किसी का छोड़कर चले जाना भी एक प्रकार की मुक्ति होता है.

_ जो व्यक्ति आपके मूल्य को नहीं समझता, जो आपके प्रेम का सम्मान नहीं करता, जो आपके समर्पण को केवल एक सीढ़ी की तरह उपयोग करता है, उसका दूर हो जाना शायद जीवन की उन व्यवस्थाओं में से एक है, जिन्हें हम पहले दुख समझते हैं और बाद में वरदान मानने लगते हैं.

_ इसलिए जब कोई आपको छोड़कर जाए, तो हर बार उसे अभिशाप मत दीजिए.

_ मन ही मन उसे धन्यवाद भी दीजिए कि उसने भ्रम समाप्त कर दिया.

_ उसने आपको उस दरवाज़े के सामने खड़े रहने से बचा लिया, जो कभी खुलने वाला ही नहीं था.

_ उसने आपको यह समझा दिया कि आपका जीवन किसी एक व्यक्ति की स्वीकृति पर निर्भर नहीं है.

_ कर्म का विधान बड़ा अद्भुत है.

_ संसार में कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों के परिणाम से हमेशा बचा नहीं रह सकता.

_ जो छल करेगा, उसे अपने छल के परिणामों का सामना करना पड़ सकता है.

_ जो विश्वास तोड़ेगा, वह कभी न कभी विश्वास की कीमत समझ सकता है.

_ जो प्रेम का अपमान करेगा, वह किसी दिन प्रेम की अनुपस्थिति का शून्य भी महसूस कर सकता है.

_ इसलिए किसी के लिए न्यायाधीश बनने की आवश्यकता नहीं है.

_ समय और कर्म, दोनों अपना कार्य करते हैं ; हमें हर परिणाम का हिसाब अपने हाथों में लेने की आवश्यकता नहीं.

_ आपका काम केवल इतना है कि आप अपने हिस्से की सच्चाई निभाइए.

_ प्रेम करिए तो पूरी ईमानदारी से करिए.

_ मित्रता निभाइए तो पूरे मन से निभाइए.

_ किसी का साथ दीजिए तो बिना हिसाब-किताब के दीजिए.

_ लेकिन बदले में क्या मिलेगा, इसकी अपेक्षाओं की गठरी अपने कंधों पर मत रखिए.

_ क्योंकि अपेक्षाएँ जितनी बड़ी होती हैं, निराशाएँ भी उतनी ही गहरी हो सकती हैं.

_ जीवन का सबसे सुंदर मार्ग शायद यही है कि हम अपने कर्मों को अपनी पहचान बनाएँ, उनके परिणामों को नहीं.

_ फूल जब खिलता है तो यह नहीं सोचता कि उसकी सुगंध किस तक पहुँचेगी.

_ नदी जब बहती है तो यह नहीं गिनती कि उसने कितनों की प्यास बुझाई.

_ सूर्य जब प्रकाश देता है तो यह अपेक्षा नहीं रखता कि कौन उसका धन्यवाद करेगा.

_ वे अपना स्वभाव निभाते हैं, और शायद मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म भी यही है.

_ अपने स्वभाव की अच्छाई को बनाए रखना.

_ इसलिए यदि कोई चला गया है, तो उसे जाने दीजिए.

_ यदि किसी ने धोखा दिया है, तो उसे उसके कर्मों के साथ छोड़ दीजिए.

_ यदि किसी ने आपका मूल्य नहीं समझा, तो स्वयं को उसके निर्णयों की कसौटी पर मत तौलिये.

_ किसी का आपको न चुनना इस बात का प्रमाण नहीं कि आप प्रेम के योग्य नहीं हैं.

_ हर व्यक्ति की दृष्टि में आपकी कीमत एक जैसी हो, यह आवश्यक नहीं.

_ लेकिन किसी की दृष्टि आपको छोटा कर दे, यह स्वीकार कर लेना भी आवश्यक नहीं.

_ अपने भीतर कड़वाहट नहीं, शांति रखिए.

_ शिकायत नहीं, अनुभव रखिए.

_ प्रतिशोध नहीं, प्रार्थना रखिए.

_ जीवन से यह शिकायत मत कीजिए कि उसने आपको गलत व्यक्ति से मिलवा दिया.

_ कभी-कभी एक गलत ठहराव ही हमें अपने सही रास्ते की पहचान कराता है.

_ जो चला गया, उसके साथ बिताए अच्छे पलों को झुठलाइए मत, मगर उन यादों को अपने वर्तमान की सज़ा भी मत बनने दीजिए.

_ अतीत को सम्मान दीजिए, उससे सीखिए और फिर अपने आज को जीने की अनुमति स्वयं को दीजिए.

_ क्योंकि जीवन का अर्थ केवल किसी का होकर रह जाना नहीं है, बल्कि किसी के चले जाने के बाद भी अपने भीतर मनुष्यता, विश्वास और प्रेम को जीवित रख पाना है.

_ टूटे हुए भरोसे के बाद भी सच्चाई पर विश्वास करना, मिले हुए छल के बाद भी छल को अपना स्वभाव न बनने देना और बिछड़ने के बाद भी किसी के प्रति नफ़रत से अपना हृदय न भर लेना, _ शायद यही भीतर से समृद्ध होने की सबसे कठिन साधना है.

_ याद रखिए, हर रिश्ता जीवन भर साथ रहने के लिए नहीं आता और हर विदाई किसी हार की घोषणा नहीं होती.

_ कुछ विदाइयाँ हमें वापस अपने पास ले आती हैं.

_ कुछ बिछड़ने हमें सिखाते हैं कि दूसरों के लिए दीपक बनते-बनते अपने भीतर के उजाले को बुझने नहीं देना चाहिए.

_ आप किसी के जीवन में क्या बनकर रहे, यह उसके व्यवहार से तय नहीं होता.

_ यह आपके प्रेम, आपकी निष्ठा और आपके आचरण से तय होता है.

_ इसलिए कर्म करते रहिए, प्रेम करते रहिए, सच्चाई पर चलते रहिए.

_ किसी के बदल जाने के कारण अपने स्वभाव की सुंदरता मत बदलिए.

_ किसी की बेवफ़ाई को अपने हृदय की भाषा मत बनने दीजिए.

_ और जब कभी बीते हुए रिश्तों की याद मन को उदास करे, तो स्वयं से बस इतना कहिए.

_ मैंने अपनी ओर से प्रेम में कोई कमी नहीं रखी.

_ अब जो मेरे हाथ में नहीं था, उसके लिए स्वयं को दोषी ठहराना भी छोड़ता हूँ.

_ आख़िरकार, जीवन में सबसे बड़ी जीत किसी को रोक लेने में नहीं, बल्कि किसी के चले जाने के बाद भी अपने भीतर के अच्छे इंसान को बचाए रखने में है.

_ क्योंकि लोग आपके जीवन से जा सकते हैं, आपकी स्मृतियों का अर्थ बदल सकता है, आपके सपने कुछ समय के लिए ठहर सकते हैं ;

_ लेकिन यदि आपने अपने भीतर की सच्चाई को बचाए रखा, तो दुनिया का कोई भी बिछोह आपसे आपका सबसे अनमोल हिस्सा नहीं छीन सकता.

_ प्रेम कीजिए, मगर स्वयं को खोकर नहीं.

_ साथ निभाइए, मगर अपने स्वाभिमान की कीमत पर नहीं.

_ और किसी को विदा करना पड़े, तो इस विश्वास के साथ कीजिए कि जीवन की कहानी किसी एक व्यक्ति के चले जाने से समाप्त नहीं होती.

_ जो चला गया, उसे जाने दीजिए.

_ जो बचा है, उसे सँभालिए.

_ क्योंकि अंततः आपको जीवन भर जिस इंसान के साथ रहना है, वह आप स्वयं हैं.!!

– Ishq Banaras

यहाँ हर चेहरे पर मुस्कान है, मगर कौन जाने कितनी आँखें रात के अँधेरे में चुपचाप भीगती हैं.

_ कितने लोग हैं जो दिनभर दुनिया को हँसाते हैं और रात को अपने ही सवालों के सामने निःशब्द बैठ जाते हैं.

_ जिनकी ज़िंदगी देखकर तुम्हें अपनी ज़िंदगी अधूरी लगने लगती है, हो सकता है वे खुद अपने हिस्से की ख़ुशियाँ जाने कब की खो चुके हों.

_ किसी ने मोहब्बत में अपना सबसे क़ीमती रिश्ता खोया है, किसी ने अपनों की उम्मीदें पूरी करते-करते अपने ही सपनों को दफ़न कर दिया है.

_ कोई घर की ज़िम्मेदारियों के नीचे दबा है, कोई भविष्य की चिंता में अपना वर्तमान खो रहा है, तो कोई सबको सँभालते-सँभालते इस क़दर बिखर चुका है कि अब उसे ख़ुद को समेटने का भी वक़्त नहीं मिलता.

_ अजीब दुनिया है यह !

_ यहाँ टूटे हुए लोगों से भी उम्मीद की जाती है कि वे मुस्कुराएँ, थके हुए कंधों से भी कहा जाता है कि वे और बोझ उठाएँ, और उदास आँखों को भी समझाया जाता है कि ज़िंदगी बहुत ख़ूबसूरत है.

_ मगर कोई यह नहीं पूछता कि उस ख़ूबसूरती को महसूस करने की ताक़त बची भी है या नहीं.

_ कितने लोग हैं जो हर रोज़ दूसरों के सामने सामान्य होने का अभिनय करते हैं, सिर्फ़ इसलिए कि उनकी ख़ामोशी से किसी को परेशानी न हो.

_ वे अपने दर्द को शब्द नहीं देते, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं उनकी तकलीफ़ किसी के लिए बोझ न बन जाए.

_ और इस तरह, धीरे-धीरे, वे सबके अपने बने रहते हैं, मगर ख़ुद से ही दूर होते चले जाते हैं.

_ कभी-कभी लगता है, यह दुनिया जितनी आबाद बाहर से दिखाई देती है, भीतर से उतनी ही वीरान होती जा रही है.

_ हर इंसान के पास अपनी एक कहानी है, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं ;

_ हर दिल में कोई अधूरा ख़्वाब है, मगर उसे समझने वाला कोई नहीं.

_ लोग अपनी उपलब्धियों की तस्वीरें साझा करते हैं, अपनी कामयाबी के क़िस्से सुनाते हैं, अपनी ख़ुशियों को दुनिया के सामने सजाकर रखते हैं, लेकिन उन तस्वीरों के बाहर छूट गए आँसुओं का हिसाब कौन रखता है ?

_ कौन देखता है उस पिता को, जो अपनी संतान के भविष्य के लिए अपनी इच्छाओं को उम्रभर टालता रहता है ?

_ कौन समझता है उस माँ को, जो पूरे घर की ख़ुशियों का ख़याल रखते-रखते अपनी उदासी का नाम तक भूल जाती है ?

_ कौन पूछता है उस नौजवान से, जो सबकी नज़रों में सफल है, मगर अपने ही जीवन से संतुष्ट नहीं ?

_ हमने इंसान की क़ीमत उसके भीतर की अच्छाई से नहीं, उसकी बाहरी चमक से आँकनी शुरू कर दी है.

_ अब किसी का दर्द सुनने से ज़्यादा दिलचस्प हमें उसकी कामयाबी जानना लगता है.

_ शायद इसीलिए चेहरे सँवरते जा रहे हैं और दिलों की थकान बढ़ती जा रही है.

_ हम एक-दूसरे को देखने में इतने व्यस्त हैं कि एक-दूसरे को महसूस करना ही भूल गए हैं. यह दुनिया अब आत्माओं का कब्रिस्तान है, जहाँ हर कोई अपने ही बनाए भ्रम में दफ़्न है.

_ यहाँ दिखावे की एक ऐसी परत चढ़ चुकी है कि सच्चाई अब असहज कर देती है.

_ लोग इंसान नहीं, ब्रांड बन गए हैं.

_ वे मुस्कुराते हैं ताकि कोई उनकी पीड़ा न देख सके.

_ वे सफल दिखते हैं ताकि कोई उनकी बेचैनी न समझ सके.

_ उनके जीवन में सब कुछ है—पैसा, पहचान, प्रतिष्ठा—पर चैन नहीं, सुकून नहीं, आत्मीयता नहीं.

_ यहाँ हर कोई दौड़ रहा है, पर किसी को नहीं पता कि मंज़िल कहाँ है.

_ महत्वाकांक्षा अब ज़हर बन चुकी है.

_ लोग अपनी सीमाओं को भूल गए हैं, अपने भीतर की थकान को झुठला रहे हैं, बस दूसरों से बेहतर दिखने की होड़ में खुद को खपा रहे हैं.

_ किसी को लगता है सारा समाज दोषी है, कोई किस्मत को गाली देता है, कोई व्यवस्था को कोसता है ;

_ पर असल में इस गंदगी के निर्माण में हमारा भी हिस्सा है.

_ हमने अपने भीतर की सच्चाई को दफ़न कर दिया और झूठ को सोने के फ़्रेम में सजाकर दीवार पर टाँग लिया.

_ हर घर अब एक मंच है, जहाँ अभिनय चल रहा है.

_ पति मुस्कुरा रहा है क्योंकि समाज को मुस्कुराहट चाहिए, पत्नी ख़ुश दिख रही है क्योंकि दुनिया को ख़ुशियाँ चाहिए, बच्चे हँस रहे हैं क्योंकि सबको दिखाने के लिए कुछ चाहिए.

_ सच्चा दुख अब लाइक नहीं लाता, सच्ची बातें अब वायरल नहीं होतीं.

_ इसलिए सब झूठ में जी रहे हैं और यही झूठ अब उनका सच बन चुका है.

_ माता-पिता अपनी खो चुकी जवानी के पछतावे में हैं, बच्चे अपनी नक़ली आज़ादी के भ्रम में.

_किसी को एक-दूसरे की ज़रूरत नहीं, बस सहूलियत चाहिए.

_ रिश्ते अब आत्मीयता नहीं, लेन-देन बन गए हैं.

_ प्यार अब एक सीन है, नीयत अब एक समझौता और फिर भी लोग कहते हैं, “हम ठीक हैं” नहीं, शायद हममें से बहुत-से लोग ठीक नहीं हैं.

_ फ़र्क़ बस इतना है कि किसी ने अपना दर्द दबा लिया है, किसी ने उसे अपनी पहचान बना लिया है, और किसी ने मुस्कुराहट के पीछे छिपना सीख लिया है.

_ इसलिए अब दूसरों को देखकर ख़ुद को मत तौलो.

_ मत बनो किसी और की कॉपी, क्योंकि हर चमकती ज़िंदगी के पीछे की कहानी तुम्हें नहीं मालूम.

_ जो चमक तुम्हें अपनी ओर खींचती है, हो सकता है उसके पीछे भी कोई ऐसी उदासी हो, जिसे दुनिया ने कभी देखा ही न हो.

_ जिसे तुम अपनी प्रेरणा समझ रहे हो, वह भी शायद अपने जीवन के किसी मोड़ पर जवाब तलाश रहा हो.

_ किसी की बाहरी कामयाबी को अपनी नाकामी का पैमाना मत बनाओ.

_ तुम्हारी ज़िंदगी की अपनी गति है, अपनी परिस्थितियाँ हैं, अपने संघर्ष हैं.

_ तुम्हें किसी और की तरह बनने की नहीं, अपने भीतर के इंसान को पहचानने की ज़रूरत है.

_ सच्ची प्रेरणा वही है जो तुम्हारे भीतर से उठे, जब तुम ख़ुद से ईमानदारी से बात करो, जब अपनी कमज़ोरियों को स्वीकारने और अपनी सच्चाई के साथ जीने की हिम्मत रखो.

_ क्योंकि यह दुनिया तुम्हें छल सकती है, चकाचौंध तुम्हें बहका सकती है, और दूसरों की ज़िंदगी से अपनी तुलना करते-करते तुम उस ख़ुशी को भी खो सकते हो, जो पहले से तुम्हारे पास है.

_ एक दिन ऐसा भी आता है, जब इंसान सब कुछ हासिल कर लेने के बाद पीछे मुड़कर देखता है और सोचता है कि इस दौड़ में उसने आख़िर अपने लिए क्या बचाया ?

_ कितने अपने पीछे छूट गए, कितनी छोटी-छोटी ख़ुशियाँ अनदेखी रह गईं, कितनी शामें बेवजह की चिंताओं में गुज़र गईं और कितनी सुबहें किसी बेहतर कल की प्रतीक्षा में बीत गईं.

_ इसलिए ठहरो, सोचो और फिर ख़ुद को सँभालो.

_ किसी और की परछाईं बनने के बजाय अपने भीतर की लौ को पहचानो.

_ अपने मन की सुनो, अपनों को वक़्त दो, अपनी थकान को स्वीकारो और ज़रूरत पड़े तो किसी अपने के सामने बिखर जाने से मत डरो.

_ हर वक़्त मज़बूत बने रहना ज़रूरी नहीं ; कभी-कभी अपनी कमज़ोरी स्वीकार कर लेना भी ख़ुद से मोहब्बत करने का सबसे सच्चा तरीक़ा होता है.

_ याद रखना, ज़िंदगी का अर्थ हर किसी से आगे निकल जाना नहीं है.

_ कभी किसी के दुःख में उसके पास बैठ जाना, बिना किसी स्वार्थ के किसी का हाथ थाम लेना, अपनों के साथ दो पल सुकून से बिता लेना और रात को सोने से पहले अपने ज़मीर के सामने शर्मिंदा न होना भी बहुत बड़ी कामयाबी है.

_ दुनिया की नज़रों में सफल होने से पहले अपनी नज़रों में इंसान बने रहना ज़रूरी है.

_ क्योंकि जिस दिन तुम्हारे पास सब कुछ होगा, मगर महसूस करने के लिए संवेदना नहीं बचेगी, उस दिन तुम्हारी सारी उपलब्धियाँ भी तुम्हारे भीतर के ख़ालीपन को नहीं भर पाएँगी.

_ यहाँ सब दिखावे में डूबे हैं.

_ सब जिए जा रहे हैं, मगर अपने भीतर की आवाज़ सुनना भूलते जा रहे हैं.

_ तुम कोशिश करना कि भीड़ में शामिल होकर ख़ुद को मत खो देना.

_ अपनी हँसी को किसी की स्वीकृति का मोहताज मत बनाना, अपने सपनों को दूसरों की अपेक्षाओं के नीचे मत दबाना और अपने मन की शांति को दुनिया की वाहवाही के बदले कभी मत बेचना.

_ तुम कोशिश करना, सिर्फ़ ज़िंदगी गुज़ारने की नहीं, उसे महसूस करने की.

_ सिर्फ़ साँसें पूरी करने की नहीं, हर साँस में थोड़ा-सा सुकून बचाए रखने की.

_ सिर्फ़ दुनिया को यह दिखाने की नहीं कि तुम ख़ुश हो, बल्कि अपने भीतर सचमुच ख़ुश होने की वजह तलाशने की.

_ क्योंकि आख़िर में तुम्हारे पास वही पल बचेंगे, जिनमें तुमने किसी को दिल से चाहा होगा, किसी के आँसू समझे होंगे, किसी के लिए बिना किसी स्वार्थ के कुछ किया होगा और कभी दुनिया की तमाम आवाज़ों के बीच अपने दिल की आवाज़ सुनी होगी.

_ ज़िंदगी बहुत छोटी है, इसे दूसरों को प्रभावित करने में मत गँवाना.

_ इसे इस तरह जीना कि जब कभी तुम ख़ुद से आँखें मिलाओ, तो तुम्हें अपने ही भीतर एक ऐसा इंसान मिले, जिसके साथ तुम्हारा मन शांति से रह सके.!!

-Ishq Banaras

कभी-कभी ज़िंदगी की भीड़ में चलते-चलते इंसान इतनी दूर निकल जाता है कि एक दिन पीछे मुड़कर देखता है, तो उसे अपना ही अतीत किसी अनजान शहर की तरह दिखाई देने लगता है.

_ वही रास्ते, वही चेहरे, वही दुनिया होती है, बस कहीं कुछ ऐसा छूट चुका होता है, जिसकी कमी को कोई दूसरा भर नहीं पाता.

_ चेहरे पर मुस्कुराहट अब भी होती है, होंठों पर बातें भी होती हैं, लोगों के बीच हँसना-बोलना भी चलता रहता है, मगर भीतर एक हिस्सा ऐसा होता है जो जाने कब से चुप बैठा है.

_ कभी जिन छोटी-छोटी बातों से आँखें चमक उठती थीं, अब वही बातें मन को छूकर भी नहीं गुज़रतीं.

_ कुछ ख़्वाब थे, जिन्हें पूरा करने की ज़िद में कभी रातें छोटी पड़ जाती थीं, आज उनका ख़याल तक आए तो मन चुपचाप कहीं और देखने लगता है.

_ शायद उम्र बढ़ने से ज़्यादा थका देती है वह ज़िंदगी, जिसमें हम सबको सँभालते-सँभालते ख़ुद को ही पीछे छोड़ आते हैं.

_ सबसे अजीब बात यह है कि इंसान की सबसे गहरी उदासी हमेशा उसकी आँखों में दिखाई नहीं देती.

_ कई बार वह अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करता है, लोगों की परेशानियों में उनका साथ देता है, दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करता है, मगर जब रात को अकेला होता है, तो उसे समझ नहीं आता कि अपने भीतर पसरी इस ख़ामोशी को किस नाम से पुकारे.

_ वह किसी से शिकायत भी नहीं करना चाहता, क्योंकि उसे मालूम है कि हर किसी के पास अपनी-अपनी लड़ाइयाँ हैं.

_ मगर कभी-कभी उसका मन भी चाहता है कि कोई उसके चेहरे के पीछे छिपी थकान पढ़ ले.

_ कोई यह न पूछे कि परेशानी क्या है, बस इतना समझ ले कि हर बार मज़बूत दिखाई देने वाला इंसान भी कभी-कभी भीतर से सहारे की उम्मीद करता है.

_ और शायद सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है, जब हम पूरी दुनिया को यह यक़ीन दिलाते-दिलाते कि हम ठीक हैं, एक दिन ख़ुद भी अपनी ही आवाज़ पर यक़ीन करने लगते हैं.

_ कभी-कभी सचमुच लगता है कि आदमी दूसरों से नहीं, सबसे ज़्यादा ख़ुद से हारता है.

_ दुनिया से लड़ना आसान है, क्योंकि वहाँ सामने कोई दूसरा होता है ;

_ मगर अपने भीतर उठते सवालों से लड़ना बहुत मुश्किल है.

_ वहाँ कोई गवाह नहीं होता, कोई फैसला सुनाने वाला नहीं होता, बस एक ख़ामोश कमरा होता है, कुछ बिखरे हुए ख़याल होते हैं और हम होते हैं, अपने ही सामने खड़े हुए.

_ रात के किसी पहर जब नींद आँखों से रूठ जाती है, तब बीते हुए बरस जाने क्यों एक-एक करके सामने आ बैठते हैं.

_ कोई चेहरा याद आता है, कोई आवाज़, कोई अधूरी बातचीत, कोई ऐसा लम्हा जिसे उस वक़्त मामूली समझकर गुज़र गया था, मगर आज वही लम्हा दिल के सबसे क़रीब बैठा हुआ है.

_ तब समझ आता है कि ज़िंदगी में सबसे कीमती चीज़ें अक्सर हमें उनकी क़ीमत समझ आने से पहले ही छोड़ जाती हैं.

_ कभी-कभी लगता है, काश कोई मेरे पास बैठकर मुझसे ये न पूछे कि क्या हुआ है.

_ बस चुपचाप बैठा रहे.

_ क्योंकि कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें बयान करने बैठो तो शब्द छोटे पड़ जाते हैं और आँखें बड़ी हो जाती हैं.

_ कुछ पीड़ाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें कह देने से हल्का नहीं हुआ जाता, बल्कि उन्हें अपने भीतर सम्मान से रखना पड़ता है, क्योंकि वे हमारे उन हिस्सों की निशानी होती हैं जो कभी बहुत सच्चे थे.

_ मैंने भी शायद यही सीखा है.

_हर बात कह देना ज़रूरी नहीं, हर रिश्ते को बचा लेना हमारे हाथ में नहीं, और हर अपना हमेशा अपना नहीं रहता.

_ कुछ लोग ज़िंदगी में आते हैं और हमें बदलकर चले जाते हैं.

_ कुछ हमें मोहब्बत सिखाते हैं, कुछ बिछड़ना, कुछ इंतज़ार और कुछ ये कि अपने होने का अर्थ किसी दूसरे के होने पर निर्भर नहीं होना चाहिए.

_ फिर भी दिल है कि मानता नहीं.

_ वह आज भी किसी अनदेखी दस्तक की उम्मीद करता है. आज भी कभी-कभी लगता है कि कोई आएगा और बिना कुछ पूछे कहेगा, “तुम बहुत थक गए हो, अब थोड़ी देर आराम कर लो”

_ शायद यही उम्मीद इंसान को जीवित रखती है.

_ वरना सच तो यही है कि कई बार जीने की वजहें हमारे पास नहीं होतीं,

_ हम बस किसी एक छोटी-सी उम्मीद को वजह मानकर आगे बढ़ते रहते हैं.

_ आज जब ये सब लिख रहा हूँ, तो महसूस हो रहा है कि मेरे भीतर भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे मैंने वर्षों से किसी के सामने नहीं रखा.

_ शायद इसलिए नहीं कि मुझे डर है कि लोग क्या सोचेंगे, बल्कि इसलिए कि कुछ बातें इतनी निजी होती हैं कि उन्हें शब्दों में उतारते हुए भी लगता है जैसे अपने ही दिल के दरवाज़े किसी अजनबी के सामने खोल रहा हूँ, और शायद मैं अब भी अजनबियों से नहीं, अपने ही भीतर से डरता हूँ.

_ क्योंकि मुझे मालूम है, अगर एक दिन सचमुच अपने भीतर उतर गया, तो वहाँ बहुत कुछ मिलेगा जिसे मैंने बड़ी मेहनत से भुलाने का अभिनय किया है.

_ कुछ चेहरे मिलेंगे, कुछ बिछोह मिलेंगे, कुछ पछतावे मिलेंगे, कुछ अधूरे ख़्वाब मिलेंगे और शायद वह इंसान भी मिलेगा, जो कभी बहुत खुश हुआ करता था और जिसे ज़िंदगी की आपाधापी में मैं कहीं पीछे छोड़ आया हूँ.

_ कभी-कभी लगता है, मुझे उसी इंसान को फिर से ढूँढ़ना है.

_ उसे वापस लाना है.

_ उसे समझाना है कि हर हार अंत नहीं होती, हर बिछड़ना मृत्यु नहीं होता और हर अँधेरी रात के हिस्से में हमेशा के लिए अँधेरा नहीं लिखा होता.

_ शायद अभी देर हुई है, मगर सब ख़त्म नहीं हुआ.

_ शायद मेरे हिस्से में अभी कुछ उजाला बाकी है.

_ शायद कुछ रास्ते अभी मेरा इंतज़ार कर रहे हैं.

_ शायद कुछ लोग अभी मुझसे मिले ही नहीं हैं और शायद मेरी ज़िंदगी की सबसे ख़ूबसूरत पंक्ति अभी लिखी ही नहीं गई.

_ इसी उम्मीद के साथ आज फिर यह पन्ना बंद कर रहा हूँ.

_ कल अगर मन ने साथ दिया, तो फिर लिखूँगा और अगर नहीं लिखा तो भी कोई बात नहीं.

_ कुछ बातें काग़ज़ पर नहीं उतरतीं, वे बस उम्र भर दिल में धड़कती रहती हैं.!!

– Ishq Banaras

कुछ दुःख ऐसे होते हैं, जिन्हें ज़िंदगी हमें नहीं देती, बल्कि हम ख़ुद अपने भीतर पाल लेते हैं.

_ न किसी ने हमारा कुछ छीना होता है, न वक़्त ने हमसे कोई वादा तोड़ा होता है, न ही हमारे हिस्से की ख़ुशियों पर किसी और ने अपना नाम लिखवा लिया होता है.

_ फिर भी मन के किसी कोने में एक टीस जन्म ले लेती है.

_ हम उन बातों के लिए उदास होने लगते हैं, जो हमारे साथ कभी हुई ही नहीं ;

_ उन ख़ुशियों के लिए तरसने लगते हैं, जिनकी कमी हमने कभी महसूस ही नहीं की थी.

_ दूसरों की ज़िंदगी में झाँकते-झाँकते हम अपनी ज़िंदगी की ख़ूबसूरती भूल जाते हैं.

_ और सबसे दर्दनाक बात यह है कि जिस दुःख को हम सीने से लगाकर बैठ जाते हैं, उसे जन्म देने वाला कोई दूसरा नहीं, हमारा अपना मन होता है.

_ हम ख़ुद ही अपने भीतर उदासी की दीवारें खड़ी करते हैं, फिर उन्हीं दीवारों के बीच बैठकर दुनिया को कोसते हैं कि हमारे हिस्से में उजाला कम क्यों है.

_ मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी शायद यही है कि वह अपनी ख़ुशियों को महसूस करने से पहले दूसरों की ख़ुशियों का हिसाब लगाने लगता है.

_ वह भूल जाता है कि हर इंसान की ज़िंदगी एक अलग कहानी है, हर कहानी का अपना मौसम है, अपने आँसू हैं, अपने इंतज़ार हैं और अपनी मंज़िलें हैं.

_ किसी की मुस्कुराहट देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि उसके भीतर कोई दर्द नहीं, और किसी की सफलता देखकर यह मान लेना भी ठीक नहीं कि हमारी अपनी यात्रा अधूरी है.

_ मगर मन है कि दूसरों के आँगन में खिले फूल गिनते-गिनते अपने घर में महकते फूलों को देखना ही भूल जाता है.

_ फिर एक दिन उसे लगता है कि उसकी ज़िंदगी में कुछ भी ख़ास नहीं, जबकि सच यह होता है कि उसकी ज़िंदगी में बहुत कुछ ख़ास था—बस उसकी नज़र दूसरों की दुनिया में उलझकर अपने ही संसार से दूर हो गई थी.

_ कभी-कभी कोई व्यक्ति अपने दोस्त को देखता है, जो करियर में आगे बढ़ रहा है, हर जगह सराहा जा रहा है, हर दिन उसके नाम की चर्चा है.

_ वह व्यक्ति जो स्वयं अपने जीवन से अभी तक संतुष्ट था, अचानक भीतर से खालीपन महसूस करने लगता है.

_ वह सोचता है, “मेरे हिस्से में ऐसा क्यों नहीं आया ?”

_ धीरे-धीरे वह यह मान बैठता है कि वह असफल है.

_ जबकि सच तो यह है कि उसकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया, बदला है तो सिर्फ़ उसका देखने का नज़रिया.

_ अब वह अपने जीवन को किसी और के फ़्रेम से देखने लगा है, और यही बदलाव एक कृत्रिम दुःख को जन्म देता है.

_ रिश्तों में भी यही खेल चलता है.

_ जब कोई यह सुनता है कि किसी का साथी हर दिन ‘आई लव यू’ कहता है, तो वह अपने रिश्ते को उसी पैमाने पर परखने लगता है.

_ उसे लगता है कि शायद उसका साथी उतना प्यार नहीं करता.

_ उसे यह महसूस नहीं होता कि हर व्यक्ति के प्रेम जताने का ढंग अलग होता है.

_ कोई शब्दों से अपना प्रेम व्यक्त करता है, तो कोई बिना कहे आपकी पसंद याद रखता है, आपकी थकान समझता है, आपकी ख़ामोशी में छिपी उदासी पढ़ लेता है.

_ लेकिन मन तुलना में उलझ जाए, तो सामने मौजूद प्रेम भी कम लगने लगता है.

_ और फिर इंसान उस प्यार से शिकायत करने लगता है, जो शायद इतने दिनों से ख़ामोशी के साथ उसके पास बैठा था.

_ सोशल मीडिया ने तो इन कृत्रिम दुःखों को एक नया रूप दे दिया है.

_ अब कोई अपने दिनभर की थकान से गुज़रता है और शाम को स्क्रीन पर किसी और की मुस्कुराती तस्वीर देखता है, किसी की यात्रा, किसी का जश्न, किसी का तथाकथित “परफ़ेक्ट” जीवन.

_ वह भूल जाता है कि तस्वीरें सच्चाई नहीं होतीं, वे सिर्फ़ चुने हुए क्षण होते हैं.

_ किसी तस्वीर में दिखाई देने वाली मुस्कान किसी के पूरे जीवन का प्रमाण नहीं होती.

_ कैमरा ख़ुशी का एक पल सँभाल सकता है, मगर वह उन रातों को नहीं दिखाता जिनमें नींद नहीं आई,

_ उन चिंताओं को नहीं दिखाता जिन्हें किसी ने अपने तकिए के नीचे छिपाकर रखा है.

_ फिर भी हम दूसरों के जीवन के कुछ सुंदर पलों की तुलना अपनी पूरी ज़िंदगी से करने लगते हैं.

_ यही वह भूल है, जो अपने ही हिस्से की ख़ुशियों को हमारी आँखों में छोटा कर देती है.

_ लोगों के जीवन का बड़ा हिस्सा इस भ्रम में बीत जाता है कि कोई और बेहतर है, कोई और ख़ुश है, कोई और आगे है.

_ वे यह नहीं समझते कि तुलना धीरे-धीरे मनुष्य को उसकी अपनी नज़रों में ही छोटा कर देती है.

_ जो व्यक्ति दूसरों की तुलना में ख़ुद को आँकना शुरू कर देता है, वह अपने अस्तित्व का मूल्य दूसरों की उपलब्धियों से तय करने लगता है.

_ किसी की सफलता उसे अपनी हार लगने लगती है, किसी की ख़ुशी उसे अपनी कमी का एहसास कराने लगती है.

_ जबकि किसी दूसरे के जीवन में खिली धूप का अर्थ यह नहीं कि हमारे हिस्से का सूरज बुझ गया है.

_ दुनिया में ख़ुशियाँ कोई ऐसी सीमित दौलत नहीं हैं, जो एक व्यक्ति को मिल जाएँ तो दूसरे के हिस्से में कम पड़ जाएँ.

_ सच्चे दुःख और कृत्रिम दुःख में यही फ़र्क़ है.

_ सच्चा दुःख किसी वास्तविक चोट, बिछोह, हानि या अधूरी रह गई चाहत से जन्म ले सकता है.

_ वह हमें भीतर तक हिला देता है, हमें अपनी कमज़ोरियों और अपनी मानवीय संवेदनाओं से परिचित कराता है.

_ वहीं तुलना से उपजा दुःख कई बार हमें उस चीज़ के लिए भी रुलाने लगता है, जिसे हमने कभी सचमुच चाहा तक नहीं था.

_ हम दूसरों को देखकर अपनी ज़िंदगी से नाराज़ होने लगते हैं, अपने रिश्तों में कमियाँ खोजने लगते हैं और अपने ही अस्तित्व पर सवाल उठाने लगते हैं.

_ हालाँकि हर दुःख को काल्पनिक कहकर नकार देना भी उचित नहीं ;

_ मन की पीड़ा भी वास्तविक होती है, भले ही उसका कारण हमारी धारणाएँ हों.

_ ज़रूरत उस पीड़ा को झुठलाने की नहीं, बल्कि यह समझने की है कि वह जन्म कहाँ से ले रही है.

_ कभी ठहरकर अपने भीतर झाँकिए.

_ ख़ुद से पूछिए कि जिस चीज़ की कमी आपको आज बेचैन कर रही है, क्या उसकी चाहत सचमुच आपके दिल में थी, या किसी और के पास उसे देखकर आपने उसे अपने लिए ज़रूरी मान लिया ?

_ क्या आप वास्तव में अपने जीवन से असंतुष्ट हैं, या आपको यह डर सता रहा है कि दुनिया की नज़र में आपका जीवन उतना शानदार नहीं है ?

_ क्या आपको सचमुच प्रेम की कमी महसूस होती है, या आप अपने प्रेम की तुलना किसी दूसरे के प्रेम जताने के तरीक़े से कर रहे हैं ?

_ इन सवालों के जवाब कभी-कभी मन के भीतर बरसों से जमा धुंध को साफ़ कर देते हैं.

_ जब कोई व्यक्ति यह समझने लगता है कि हर जीवन की गहराई अलग है, हर इंसान का संघर्ष अलग है और हर किसी के खिलने का मौसम अलग है, तब वह धीरे-धीरे इन अनावश्यक तुलनाओं से मुक्त होने लगता है.

_ उसे एहसास होता है कि किसी का आगे निकल जाना उसके पीछे रह जाने का प्रमाण नहीं है.

_ किसी का अधिक पा लेना उसके कम होने की घोषणा नहीं है.

_ और किसी की चमक के सामने अपने उजाले को छोटा समझ लेना अपने ही साथ की गई नाइंसाफ़ी है.

_ ज़िंदगी कोई दौड़ नहीं, जिसमें हर किसी को एक ही समय पर एक ही मंज़िल तक पहुँचना हो.

_ कुछ लोग जल्दी सफल होते हैं, कुछ देर से अपनी राह पहचानते हैं.

_ कोई कम उम्र में बहुत कुछ पा लेता है, तो कोई लंबा सफ़र तय करने के बाद समझ पाता है कि उसे वास्तव में चाहिए क्या.

_ किसी के जीवन में रिश्तों की बहार होती है, तो किसी के जीवन में आत्मनिर्भरता का सुकून.

_ किसी के पास दुनिया को दिखाने के लिए बहुत कुछ होता है, तो किसी के पास रात को सिरहाने बैठकर महसूस करने लायक एक छोटी-सी शांति होती है.

_ हर जीवन की अपनी गरिमा है, बशर्ते हम उसे दूसरों की कसौटी पर तौलना बंद कर दें.

_ अगर इंसान हर बात को अपने ऊपर लेना, हर दृश्य में ख़ुद को तलाशना और हर अनुभव को अपनी कमी का प्रमाण मानना छोड़ दे, तो उसकी मानसिक पीड़ा का एक बड़ा हिस्सा हल्का हो सकता है.

_ हर ख़ुशी को देखकर यह सोचना ज़रूरी नहीं कि हमारे पास वह क्यों नहीं है.

_ हर सफलता को देखकर अपने भीतर असफलता का ऐलान करना ज़रूरी नहीं.

_ हर रिश्ते को दूसरे रिश्ते जैसा होना भी ज़रूरी नहीं.

_ कभी-कभी जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ नया हासिल करने से ज़्यादा ज़रूरी होता है, पहले से मौजूद चीज़ों को एक नई दृष्टि से देखना.

_ हमें यह सीखना होगा कि हर चीज़ को अपने जीवन से जोड़कर देखना आवश्यक नहीं है.

_ कुछ चीज़ों को केवल देखकर भी आगे बढ़ा जा सकता है.

_ किसी की ख़ुशी को देखकर उसके लिए ख़ुश हुआ जा सकता है, बिना अपनी उदासी का हिसाब लगाए.

_ किसी की सफलता की सराहना की जा सकती है, बिना अपनी असफलताओं की सूची खोले.

_ किसी के सुंदर जीवन की तस्वीर देखकर मुस्कुराया जा सकता है, बिना अपने जीवन को कमतर ठहराए.

_ दूसरों की ख़ुशी में ख़ुश हो पाना और अपनी ख़ुशी के लिए दूसरों से प्रमाण न माँगना, मन की एक बड़ी आज़ादी है.

_ क्योंकि जीवन की शांति हर इच्छा पूरी हो जाने में नहीं, बल्कि हर इच्छा को अपनी शांति पर हावी न होने देने में भी छिपी है.

_ हर सवाल का जवाब मिल जाना ज़रूरी नहीं, हर कमी का पूरा हो जाना भी ज़रूरी नहीं.

_ कभी-कभी ज़रूरी सिर्फ़ इतना होता है कि हम अपने मन को थोड़ी देर के लिए चुपचाप बैठने दें,

_ उसे दूसरों की ज़िंदगी के हिसाब-किताब से छुट्टी दें और अपने भीतर मौजूद उस जीवन को महसूस करें, जिसे हम लगातार बेहतर बनाने की कोशिश में जीना ही भूल गए हैं.

_ याद रखिए, आपके पास जो है, वह इसलिए छोटा नहीं हो जाता कि किसी दूसरे के पास उससे अधिक है.

_ आपकी मुस्कान की क़ीमत किसी और की मुस्कान से तय नहीं होती.

_ आपके संघर्षों का महत्व किसी और की उपलब्धियों से कम नहीं होता.

_ और आपका जीवन इसलिए अधूरा नहीं हो जाता कि वह किसी दूसरे के जीवन जैसा नहीं है.

_ जिस दिन आप दूसरों के आँगन में खिले फूलों को देखकर अपने आँगन की मिट्टी से शिकायत करना छोड़ देंगे, उसी दिन आपको एहसास होगा कि आपके भीतर भी बहुत कुछ खिलने की प्रतीक्षा कर रहा था.

_ जिस दिन आप दूसरों की रोशनी में अपनी चमक तलाशना बंद कर देंगे, उसी दिन अपने भीतर का दीपक दिखाई देने लगेगा.

_ आख़िरकार, जीवन का सबसे गहरा सुकून शायद किसी और जैसा बन जाने में नहीं, बल्कि अपने जैसा होने को स्वीकार कर लेने में है.

_ यह समझ लेने में है कि हर चमक हमारी आँखों के लिए नहीं, हर मंज़िल हमारे रास्ते की नहीं और हर ख़ुशी का हमारे जीवन में होना आवश्यक नहीं.

_ कुछ चीज़ें दूसरों के हिस्से में सुंदर लगती हैं, और कुछ हमारे हिस्से में आकर अपना अर्थ पाती हैं.

_ जब मन तुलना की बेड़ियों से मुक्त होता है, तब जीवन अचानक बदल नहीं जाता, लेकिन उसे देखने वाली आँखें बदल जाती हैं.

_ वही घर थोड़ा अधिक अपना लगने लगता है, वही रिश्ते थोड़े अधिक अनमोल, वही सुबह थोड़ी अधिक सुंदर और वही साधारण-सा दिन जीने लायक लगने लगता है.

_ हमें समझ आता है कि शांति कहीं दूर से मिलने वाली कोई उपलब्धि नहीं थी ;

_ वह तो हमारे भीतर ही थी, बस हम उसे दूसरों की ज़िंदगी में खोजते रहे.

_ इसलिए कभी अपने मन से भी प्रेम कीजिए.

_ उसे हर दिन किसी परीक्षा में मत बैठाइए.

_ उसे दूसरों से जीतने के लिए मजबूर मत कीजिए.

_ उसे यह विश्वास दीजिए कि उसे हर किसी से बेहतर साबित हुए बिना भी ख़ुश रहने का अधिकार है.

_ उसे समझाइए कि जीवन कोई प्रतियोगिता नहीं, एक अनुभव है ; कोई हिसाब की किताब नहीं, एक यात्रा है.

_ और जब कभी मन फिर किसी तुलना में उलझने लगे, तो बस एक पल ठहरकर अपने जीवन की ओर देखिए..- उन लोगों की ओर, जो आपकी परवाह करते हैं.

_ उन छोटी-छोटी ख़ुशियों की ओर, जिन्हें आपने मामूली समझकर अनदेखा कर दिया.

_ उन कठिन दिनों की ओर, जिन्हें पार करके आप आज यहाँ तक पहुँचे हैं.

_ शायद तब महसूस होगा कि जिस शांति को पाने के लिए आप दुनिया भर में भटक रहे थे, वह आपके अपने ही भीतर आपका इंतज़ार कर रही थी.

_ क्योंकि ज़िंदगी की सबसे बड़ी ख़ुशी हमेशा वह नहीं होती, जो हमें मिल जाती है ;

_ कई बार वह भी होती है, जो दूसरों के पास देखकर हम अपने जीवन से माँगना छोड़ देते हैं.

_ और जिस दिन मन यह सीख लेता है, उस दिन दुनिया की सारी चमक के बीच भी वह अपने छोटे-से उजाले में ख़ुश रहना सीख जाता है.

_ फिर न किसी की सफलता उसे छोटा करती है, न किसी की ख़ुशी उसे उदास करती है.

_ वह बस जीता है..- अपने हिस्से की धूप में, अपने हिस्से की छाँव में, अपनी अधूरी इच्छाओं और छोटी-छोटी संतुष्टियों के साथ.

_ शायद यही जीवन का सबसे सुंदर सत्य है.

_ ‌सुकून तब नहीं आता, जब हमारे पास दुनिया की हर चीज़ आ जाती है ;

_ सुकून तब आता है, जब दुनिया की हर चीज़ पाने की बेचैनी हमारे भीतर से उतरने लगती है.

_ और उस पल मन बहुत धीरे से कहता है.

_ अब किसी और जैसा होने की ज़रूरत नहीं.

_ जो जीवन मेरे पास है, उसे प्रेम से जीना ही मेरे लिए पर्याप्त है.!!

– Ishq Banaras

कभी-कभी जीवन की आपाधापी से दूर, जब इंसान अपने ही भीतर उतरकर देखता है, तो उसे एहसास होता है कि उसने दूसरों के लिए जीते-जीते अपने हिस्से का जीवन कब पीछे छोड़ दिया, उसे पता ही नहीं चला.

_ जिस दिल ने बचपन से अपनों की खुशियों के लिए अपनी इच्छाओं को चुपचाप दफ़न किया, जिसने हर मुश्किल में दूसरों का हाथ थामा, हर टूटते रिश्ते को बचाने की कोशिश की और हर बार स्वयं बिखरकर भी दूसरों को समेटता रहा, उसी दिल के हिस्से में यदि बार-बार उपेक्षा, अपमान, छल और तिरस्कार आए, तो उसकी ख़ामोशी के पीछे कितना गहरा दर्द जमा होता होगा ?

_ वह बाहर से भले ही सामान्य दिखाई दे, लेकिन उसके भीतर न जाने कितनी अनकही शिकायतें, अधूरे सवाल और आँसुओं में भीगती हुई यादें एक-दूसरे से लिपटकर जी रही होती हैं.

_ और सबसे अधिक पीड़ा तब होती है, जब वह किसी और से नहीं, बल्कि अपने ही लोगों से पूछने लगता है कि आख़िर मेरी कमी क्या थी ?

_ मैंने तो बस तुम्हें अपना समझा था.

_ कभी-कभी सोचता हूँ, क्या किसी का सच्चे दिल से चाहना ही उसकी सबसे बड़ी भूल बन जाता है ?

_ क्या हर बार दूसरों के लिए खड़े रहने वाले इंसान को यह हक़ नहीं कि कभी कोई उसके लिए भी खड़ा हो ?

_ क्या जो व्यक्ति सबकी तकलीफ़ समझता रहा, उसकी ख़ामोशी को समझने वाला कोई नहीं हो सकता ?

_ बचपन में हम रिश्तों को किसी हिसाब-किताब की तरह नहीं जीते.

_ हम यह सोचकर किसी का हाथ नहीं थामते कि बदले में हमें क्या मिलेगा.

_ हम तो बस अपनेपन को सच मान लेते हैं, अपनों की मुस्कान में अपनी खुशी ढूँढ़ लेते हैं और उनके दुःख को अपना समझकर उनके साथ चल पड़ते हैं.

_ लेकिन जब वही अपने बार-बार हमारे विश्वास को चोट पहुँचाते हैं, जब हमारी निष्ठा को हमारी मजबूरी और हमारी अच्छाई को हमारी कमज़ोरी समझ लिया जाता है, तब इंसान केवल दूसरों से निराश नहीं होता, उसका अपने ही उस रूप से विश्वास उठने लगता है, जो कभी दुनिया को बेहद साफ़ नज़र से देखा करता था.

_ बचपन में हमें सिखाया जाता है कि अच्छे बनो, सबकी मदद करो, अपनों के लिए त्याग करो.

_ हम सचमुच विश्वास कर लेते हैं कि निस्वार्थता ही जीवन का सबसे ऊँचा धर्म है.

_ और फिर हम उसी धर्म का निर्वाह करते रहते हैं परिवार के लिए, रिश्तेदारों के लिए, मित्रों के लिए, शिक्षकों के लिए… हर उस व्यक्ति के लिए जिसे हम अपना मानते हैं.

_ हम थकान नहीं गिनते, हम अपमान नहीं गिनते, हम अपने हिस्से की इच्छाएँ तक स्थगित कर देते हैं.

_ पर धीरे-धीरे एक अजीब सन्नाटा पनपने लगता है.

_ जब हर बार तुम्हें ही समझौता करना पड़े.

_ जब हर गलती का बोझ तुम्हारे कंधे पर डाल दिया जाए.

_ जब तुम्हारे त्याग को स्वाभाविक और तुम्हारे दर्द को अतिशयोक्ति कहा जाए.

_ तब भीतर कहीं एक महीन दरार पड़ती है.

_ शुरुआत में वह दरार दिखाई नहीं देती.

_ व्यक्ति मुस्कुराता रहता है, निभाता रहता है, अपने को समझाता रहता है कि कोई बात नहीं, यही जीवन है, अपेक्षा नहीं करनी चाहिए.

_ लेकिन अपेक्षा करना मानवीय है.

_ सम्मान की चाह रखना अपराध नहीं है.

_स्नेह की प्रत्याशा स्वार्थ नहीं है.

_ जब वर्षों तक इन मूल मानवीय जरूरतों को नकारा जाता है, तब मन में एक धीमा विष जमा होने लगता है.

_ वह अचानक नहीं फैलता, वह बूंद-बूंद रिसता है हर अपमान के साथ, हर धोखे के साथ, हर उस क्षण के साथ जब तुम्हारी सच्चाई को हल्के में लिया जाता है.

_ और फिर एक दिन वही मन जो कभी सबके लिए पिघलता था, कठोर होने लगता है.

_ तुम्हें लोग स्वार्थी दिखने लगते हैं.

_ हर मुस्कान में गणित दिखता है.

_ हर संबंध में लाभ-हानि का हिसाब दिखता है.

_ तुम्हें स्वयं से भी घिन आने लगती है कि तुम इतने सरल क्यों थे.

_ और सबसे भयानक बात यह है कि जब तुम्हारा आक्रोश बाहर आता है, जब तुम्हारा मौन भारी हो जाता है, जब तुम पीछे हटने लगते हो, तब भी दोषी तुम्हें ही ठहराया जाता है.

_ यह कहकर कि तुम बदल गए हो, तुम नकारात्मक हो गए हो, तुम्हारे भीतर कड़वाहट आ गई है.

_ कोई यह नहीं पूछता कि यह कड़वाहट उगी कहाँ से.

_ कोई यह नहीं देखता कि जिस व्यक्ति को आज कठोर कहा जा रहा है, वही कभी सबसे अधिक कोमल था.

_ सच्चाई यही है कि निरंतर उपेक्षा मन को विषैला बना सकती है.

_ वह ज्वालामुखी बनता है—बाहर से शांत, भीतर से लावा से भरा हुआ.

_ और जब वह फटता है, तो सबसे पहले उसी व्यक्ति को झुलसा देता है जिसके भीतर वह पल रहा था.

_ नफ़रत धीरे-धीरे दूसरों से अधिक स्वयं को खाती है.

_ मैं मानता हूँ कि यह जीवन बहुतों का है.

_ बहुत लोग ऐसे हैं जो निभाते-निभाते भीतर से टूट जाते हैं.

_ जो दूसरों की ढाल बनते-बनते स्वयं नंगे खड़े रह जाते हैं.

_ जो सबकी सुनते-सुनते अपने मन की आवाज़ पहचानना भूल जाते हैं.

_ लेकिन एक और सत्य है.

_ यदि यह विष भीतर ही भीतर पलता रहा, तो अंततः वह जीवन की दिशा को अंधकार में ले जा सकता है.

_ नफ़रत स्थायी निवास नहीं है ; वह एक ऐसी प्रतिक्रिया है जो लंबे समय तक अनसुने रहे दर्द से जन्म ले सकती है.

_ घृणा समाधान नहीं है ; वह थके हुए मन का बचाव है.

_ शायद जीवन की दिशा तब बदलती है, जब व्यक्ति पहली बार यह स्वीकार करता है कि मैं भी महत्वपूर्ण हूँ.

_ जब वह सीमाएँ खींचना सीखता है.

_ जब वह बिना अपराधबोध के ‘न’ कहना सीखता है.

_ जब वह यह समझता है कि त्याग और आत्म-उपेक्षा एक ही चीज़ नहीं हैं.

_ दर्द को नकारना समाधान नहीं है.

_ उसे पहचानना, स्वीकारना और उसकी जड़ों को समझना—यही शायद पहला उपचार है.

_ मैं यह नहीं कहता कि सब अचानक बदल जाएगा.

_ जो वर्षों से जमा हुआ है, वह एक दिन में नहीं धुलेगा.

_ लेकिन यदि मन में यह बोध जाग जाए कि मेरी करुणा मेरी कमजोरी नहीं थी, बस उसका दुरुपयोग हुआ, तो शायद भीतर की आग थोड़ी शांत हो सके.

_ जीवन को नफ़रत में बदल देना आसान है.

_ विश्वास को पुनः गढ़ना कठिन है.

_ पर अंततः वही व्यक्ति विजयी होता है, जो अपने भीतर के विष को पहचानकर उसे धीरे-धीरे बाहर निकालने का साहस रखता है.

_ क्योंकि यदि हम भी वही बन जाएँ, जिससे हमें घृणा है, तो हमारे सारे त्याग, सारे संघर्ष व्यर्थ हो जाएँगे.

_ शायद दिशा यह नहीं कि हम कठोर हो जाएँ.

_ दिशा यह है कि हम सजग हो जाएँ.

_ निष्क्रिय होकर सब कुछ सहने वाले नहीं, बल्कि आत्मसम्मान के साथ खड़े रहने वाले बनें.

_ हर किसी के लिए उपलब्ध रहने के बजाय उन रिश्तों को महत्व दें, जहाँ हमारी भावनाओं की भी कद्र हो.

_ हर टूटे हुए संबंध को अकेले जोड़ने के बजाय यह भी समझें कि कुछ रिश्तों को बचाने की जिम्मेदारी दोनों तरफ होती है.

_ क्योंकि हर बार झुक जाना बड़प्पन नहीं होता, हर बार चुप रहना शांति नहीं होती और हर बार माफ़ कर देना इस बात की गारंटी नहीं कि सामने वाला बदल जाएगा.

_ कभी-कभी अपने मन की रक्षा के लिए दूरी बनाना भी आवश्यक होता है.

_ किसी को क्षमा कर देना और उसे फिर से वही अधिकार दे देना—दो अलग बातें हैं.

_ और शायद एक दिन ऐसा भी आता है, जब इंसान पीछे मुड़कर अपने बीते हुए कल को देखता है और स्वयं से कहता है—मैंने लोगों को चाहने में कोई गलती नहीं की थी.

_ मेरी गलती बस इतनी थी कि मैं सबको बचाते-बचाते स्वयं को बचाना भूल गया था.

_ अब मैं किसी से नफ़रत करके नहीं, बल्कि स्वयं को समझकर आगे बढ़ूँगा.

_ अब मेरी अच्छाई मेरी विवशता नहीं होगी, मेरा त्याग मेरी पहचान का अकेला आधार नहीं होगा और मेरा मौन किसी के अन्याय की सहमति नहीं बनेगा.

_ तब शायद यह ज्वालामुखी राख में बदल जाए—ऐसी राख, जिसमें बीते हुए दुःखों की स्मृतियाँ तो रहें, लेकिन वे भविष्य की हरियाली को न रोकें.

_ और उसी राख से एक दिन फिर कोई नया, संतुलित और शांत जीवन अंकुरित हो सके.

_ क्योंकि अंततः हमें अपने भीतर की अच्छाई को बचाना है, लेकिन उस अच्छाई की कीमत पर स्वयं को मिटाना नहीं है.

_ हमें प्रेम करना है, मगर अपने आत्मसम्मान को खोकर नहीं.

_ हमें अपनों का साथ देना है, मगर अपने ही मन को अकेला छोड़कर नहीं.

_ और यदि कभी जीवन की लंबी यात्रा में ऐसा लगे कि अब भीतर कुछ भी शेष नहीं बचा, तो बस एक बार अपने उस पुराने रूप को याद करना, जिसने बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की थी.

_ उसे दोष मत देना.

_ वह भोला नहीं था, वह सच्चा था.

_ वह कमज़ोर नहीं था, वह संवेदनशील था.

_ उसे दुनिया की कठोरता ने थकाया होगा, लेकिन उसकी अच्छाई अपने आप में कोई अपराध नहीं थी.

_ अब बस इतना करना है कि जिस करुणा को तुमने जीवन भर दूसरों पर लुटाया, उसकी थोड़ी-सी रोशनी अपने भीतर भी बचाकर रखना.

_ क्योंकि दुनिया को अच्छा बनाने की कोशिश में स्वयं के भीतर की दुनिया को उजाड़ देना कोई त्याग नहीं है.

_ सच्ची जीत तब होगी, जब इतने दर्द से गुज़रने के बाद भी तुम्हारे भीतर इंसानियत जीवित रहे.

_ और इस बार उस इंसानियत में तुम्हारे लिए भी उतनी ही जगह हो, जितनी तुमने हमेशा दूसरों के लिए बनाई थी.!!

– Ishq Banaras

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