मस्त विचार 2715
दह जाऊँ तो आग, बह जाऊँ तो नीर
ढह जाऊँ तो रेत सह जाऊँ तो पीर.
ढह जाऊँ तो रेत सह जाऊँ तो पीर.
_गैरों को क्या पता रग कौनसी दबानी है..!!
_उन अपनों से जो अपने होने का आडम्बर रचते हैं, _दरअसल वे कभी हमारे नहीं होते..!!
गलत समझने से बेहतर होता है.
_ तो जो मिला हुआ है उसको भी खो दोगे.
_ परंतु जो प्राप्त था, उसे खो कर फिर पाना अत्यंत कठिन है !!
पर शब्द सभी को स्पर्श कर जाते हैं.
लाजवाब मोती किनारों पे नहीं मिलते.