मस्त विचार 2533
ये भी कैसा ‘समय’ आया कि… “दूरियाँ” ही ‘दवा’ बन गईं.
हमेशा यही सोचो कैसे होगा.
आज वो फुर्सत में बैठकर सोचते हैं जीना कैसे है..!!
वरना इन आँखों से गिरने वाले आंसुओं का भी,
एक अलग ही समुन्दर होता.
अगर कहूँ के उदास हूँ मैं….
पर हम उस दर्द को समय के साथ साथ सहने के आदी हो जाते हैं.