मस्त विचार 2582
फुर्सत मिले जब भी रंजिशे भूला देना,
कौन जाने सांसों की मोहल्लतें कहाँ तक हैं।।
कौन जाने सांसों की मोहल्लतें कहाँ तक हैं।।
दूर से देखने पर हम ज़रा मग़रूर दिखते हैं.
एक दिन “हँसा” कर महीनों “रुलाती” है !
जहां से चले थे फिर वहीँ आ गए हम..
कोई मेरा रास्ता रोकने की कोशिश कर सकता है…
लेकिन मेरी मंजिल और काबिलियत नहीं….
और शाम होते-होते, मेरा आज भी चला गया.