मस्त विचार 4788
#अभी_हार_साबित_कहाँ_हुई_मैं_अभी_बाकी_हूँ,
#बस_ तू _साथ_दे_मेरा_मैं_अकेला_ही_काफी_हूँ..
#बस_ तू _साथ_दे_मेरा_मैं_अकेला_ही_काफी_हूँ..
कर्म की शाख को भी हिलाना पड़ता है..
सोच रहा हूँ _ जब मिले थे तो _ कौन सा हुनर था मुझमें..
मैं स्नेह का धागा हूँ _ मजबूरी की जंजीर नहीं..!!
ख़ाक हूँ मैं, ख़ाक पर क्या ख़ाक इतरा के चलूँ..