मस्त विचार 2390
खुद पुकारेगी मंज़िल तो ठहर जाऊँगा, _
_ वरना खुद्दार मुसाफ़िर हूँ,,,, गुज़र जाऊँगा ..
_ वरना खुद्दार मुसाफ़िर हूँ,,,, गुज़र जाऊँगा ..
वक्त तुम्हे हम जैसे किसी से मिलवा दे तो..
दामन पकड़ के रोक लेना.
बस ….कोई विकल्प नहीं था.
“मेरी नज़र” किताबो पर कभी गई ही नही.
उदास कर के मुझे खुद भी खुश नहीं रहता.
उम्मीदों से ही घायल है और उम्मीदों पर ही जिंदा है…!
_जो गिर कर फिर से उड़ चला वही जिंदा है.!!