मस्त विचार – वो अवकाश चाहिए – 2000

*अवकाश*

मन की थकन जो उतार दे, वो अवकाश चाहिए।

इस भागती सी जिंदगी में, फुरसत की सांस चाहिए ।

चेहरों को नहीं दिल को भी, पढने का वक्त हो ….

मोबाइल लैपटॉप से, कुछ पल…संन्यास चाहिए।

मन की जमीं के सूखे, पर तो…ध्यान ही नहीं।

कब बन गए उसर…हमें ये भान ही नहीं।

कोई फूल इस पर खिलने को…प्रयास चाहिए ।

अपनों की देखभाल का…एहसास चाहिए ।

अब बहुत मन भर गया बड़प्पन और मान से।

है बहुत तृप्त अहम, झूठी आन बान शान से।

इसको भी एक दिन का, उपवास चाहिए ।

बन जाऊं, तितली या परिंदा कोई….वो आभास चाहिए ।

मन की थकन जो उतार दे, वो *अवकाश* चाहिए..‼

 

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