मस्त विचार 1954

दर्द कैसा भी हो, आँखें नम न करो,

रात काली ही सही, गम न करो,

एक सितारा बनो और जगमगाते रहो,

जिन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो.

मस्त विचार – सब कुछ किसी को नहीं मिलता – 1953

सब कुछ किसी को नहीं मिलता,

गुलाब के पास सुगंध है तो चमक नहीं,

सोने के पास चमक है तो सुगंध नहीं,

कोयल के पास कंठ है पर सौंदर्य नहीं,

मोर के पास सौंदर्य है पर कंठ नहीं,

कुछ न कुछ कम या अधूरा रह ही जाता है.

मस्त विचार – “वक़्त जाता रहा” – 1952

“वक़्त जाता रहा”

नाकामियों को अपनी संवारते ही रहे हम.

खंडहरों में जिंदगी तलाशते ही रहे हम.

उठते रहें हैं अक्सर तूफां बीती यादों के.

सुबह शाम यादों को बुहारते ही रहे हम.

न की परवा किसी ने रत्तीभर भी हमारी.

मारे दर्द के दिन रात कराहते ही रहे हम.

अपनी मदद को कोई इक बार भी न आया.

पुकारने को तो सब को पुकारते ही रहे हम.

जब वक़्त पड़ा हम पर, सब मुहं मोड़ बैठे.

रिश्तों की पोटली को संभालते ही रहे हम.

“वक़्त जाता रहा”

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