मस्त विचार 1957
क्योंकि खुशियों के तो दावेदार बहुत हैं.
क्योंकि खुशियों के तो दावेदार बहुत हैं.
क्या हमें इसे हलके में लेना चाहिए ?
पर…बिखरे पन्नों को, पहले प्यार से चिपकाइये !!
रात काली ही सही, गम न करो,
एक सितारा बनो और जगमगाते रहो,
जिन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो.
गुलाब के पास सुगंध है तो चमक नहीं,
सोने के पास चमक है तो सुगंध नहीं,
कोयल के पास कंठ है पर सौंदर्य नहीं,
मोर के पास सौंदर्य है पर कंठ नहीं,
कुछ न कुछ कम या अधूरा रह ही जाता है.
नाकामियों को अपनी संवारते ही रहे हम.
खंडहरों में जिंदगी तलाशते ही रहे हम.
उठते रहें हैं अक्सर तूफां बीती यादों के.
सुबह शाम यादों को बुहारते ही रहे हम.
न की परवा किसी ने रत्तीभर भी हमारी.
मारे दर्द के दिन रात कराहते ही रहे हम.
अपनी मदद को कोई इक बार भी न आया.
पुकारने को तो सब को पुकारते ही रहे हम.
जब वक़्त पड़ा हम पर, सब मुहं मोड़ बैठे.
रिश्तों की पोटली को संभालते ही रहे हम.
“वक़्त जाता रहा”