मस्त विचार – “वक़्त जाता रहा” – 1952

“वक़्त जाता रहा”

नाकामियों को अपनी संवारते ही रहे हम.

खंडहरों में जिंदगी तलाशते ही रहे हम.

उठते रहें हैं अक्सर तूफां बीती यादों के.

सुबह शाम यादों को बुहारते ही रहे हम.

न की परवा किसी ने रत्तीभर भी हमारी.

मारे दर्द के दिन रात कराहते ही रहे हम.

अपनी मदद को कोई इक बार भी न आया.

पुकारने को तो सब को पुकारते ही रहे हम.

जब वक़्त पड़ा हम पर, सब मुहं मोड़ बैठे.

रिश्तों की पोटली को संभालते ही रहे हम.

“वक़्त जाता रहा”

मस्त विचार – सुकून उतना ही देना – 1951

सुकून उतना ही देना, जितने से जिंदगी चल जाए,

औकात बस इतनी देना कि, औरों का भला हो जाए,

रिश्तो में गहराई इतनी हो कि, प्यार से निभ जाए,

आँखों में शर्म इतनी देना कि, बुजुर्गों का मान रख पायें,

साँसे पिंजर में इतनी हों कि, बस नेक काम कर जाएँ,

बाकी उम्र ले लेना कि, औरों पर बोझ न बन जाएँ.

मस्त विचार 1950

मेरा बिगड़ा हुआ लहजा दिखता है सबको,

_मेरी बिखरी हुई जिंदगी किसी को नहीं दिखती..!!

कहाँ-कहाँ से तुझे संभालूं ए ज़िन्दगी,

_जहाँ देखता हूँ तू बिखरी नज़र आती है..!!

मस्त विचार – मन का अफसाना है – 1947

सुख दुख मन का अफसाना है.

वैसे अकेले ही आये है और अकेले ही जाना है,

कैसा भी हो बंधन एक दिन तो टूट जाना है,

कोई कितना भी रहे पास या कितना भी रहे दूर,

सुख दुख का जलवा अपने ही मन का अफसाना है.

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