मस्त विचार 1958
स्वयं को कभी परिभाषित नहीं किया मैंने,
ये फैसला हर बार सामने वाले पे छोड़ा मैंने…
ये फैसला हर बार सामने वाले पे छोड़ा मैंने…
क्योंकि खुशियों के तो दावेदार बहुत हैं.
क्या हमें इसे हलके में लेना चाहिए ?
पर…बिखरे पन्नों को, पहले प्यार से चिपकाइये !!
रात काली ही सही, गम न करो,
एक सितारा बनो और जगमगाते रहो,
जिन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो.
गुलाब के पास सुगंध है तो चमक नहीं,
सोने के पास चमक है तो सुगंध नहीं,
कोयल के पास कंठ है पर सौंदर्य नहीं,
मोर के पास सौंदर्य है पर कंठ नहीं,
कुछ न कुछ कम या अधूरा रह ही जाता है.