मस्त विचार 1994
ऐ खुदा…एक तेरा ही दर है, जहां कभी ताना नहीं मिला.
मस्त विचार 1993
मुफलिसी का दुःख दर्द जो, हमसे ही तू निभाती क्यों है.
माना हो रहा बदन में दर्द , फिर सोने दे जगाती क्यों है.
मिला है खुदा ए रहमो करम, ना मारना तो सुलाती क्यों है.
जोकर सा अभिनय करा के, हंसाकर फिर रुलाती क्यों है.
जाएगा मुफलिसी का समय, तू आज कहंकहाती क्यों है.
होगा खत्म तेल दीपक का, बुझा मुझे जगमगाती क्यों है.
जख्म देना है फितरत तेरी, देख दर्द तू मुस्कुराती क्यों है.
है ललक कुमार में जीने का, मुझे मरना सिखाती क्यों है.
मस्त विचार 1992
हमने तो आसमां को बस अपनी दास्ताँ सुनाई थी…
मस्त विचार 1991
मैं खुद लौट जाऊंगा मुझे नाकाम तो होने दो…
मुझे बदनाम करने का बहाना ढूंढ़ता है जमाना….!
मैं खुद हो जाऊंगा बदनाम पहले मेरा नाम तो होने दो.
मस्त विचार 1990
किसी की बुराई करने जैसा आसान कोई काम नहीं.
“स्वयं” को पहचानने से अधिक कोई “ज्ञान” नहीं.
और “क्षमा” करने से बड़ा कोई “दान” नहीं.
लोग कहते है कि आदमी को अमीर होना चाहिए..
और हम कहते है कि आदमी का जमीर होना चाहिए..॥





