मस्त विचार – मन का अफसाना है – 1947

सुख दुख मन का अफसाना है.

वैसे अकेले ही आये है और अकेले ही जाना है,

कैसा भी हो बंधन एक दिन तो टूट जाना है,

कोई कितना भी रहे पास या कितना भी रहे दूर,

सुख दुख का जलवा अपने ही मन का अफसाना है.

मस्त विचार 1945

युहीं पूछ लेता हूँ खुद से, मैं मुसाफिर हूँ या गुमशुदा,

अपने ही घर से निकलता हूँ, अपने ही घर की तलाश में………

मस्त विचार 1944

मेरे पास कहने के लिये बहोत कुछ है, पर सुननेवाला कोई नही है..

_ और इन दोनों में से किसी एक को न चुन पाने की कशमकश में रह जाता हूँ..!!

मस्त विचार 1942

“बचपन में” जब धागों के बीच माचिस की डिब्बी को फँसाकर फोन-फोन खेलते थे,

तो मालूम नहीं था एक दिन इस फोन में ज़िंदगी सिमटती चली जायेगी।।।

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