मस्त विचार 1681

कुछ अपने लिए लिखता हूँ कुछ रब के लिये लिखता हूँ,

जो नही कर सकते अपना दर्द-ए-दिल बयां,

मैं उन सब के लिए लिखता हूँ.

मस्त विचार 1680

अपनों से कभी दुरी इतनी ना बढ़ाएं कि _

_ खुला हो दरवाज़ा, फिर भी खटखटाना पड़े ..

कुछ दरवाजे कभी बंद नहीं हुआ करते हैं,,

_ बस हम ही खटखटाना छोड़ देते हैं…!!

मस्त विचार 1679

सीढ़ियां उन्हें मुबारक हो जिन्हें छत तक जाना है,

मेरी मंज़िल तो आसमान है रास्ता मुझे खुद बनाना है !!!

मस्त विचार 1678

हमें यह आशा छोड़ देनी चाहिए कि समुद्र कभी शांत हो जाएगा.

हमें तेज हवाओं में नौका चलाने की आदत डालनी चाहिए.

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