मस्त विचार 1490

मगन था मैं…सब्जी में कमी निकालने में,

और कोई खुदा से…सूखी रोटी का शुक्र मना रहा था.

सारे वजन उठा कर देख लिए, दाल रोटी ही सबसे भारी है..!!
कोई कितनी भी चालें चले, पर आज भी दुनियाँ का बहुत बड़ा वर्ग ईमानदारी की रोटी पर ही जिंदा है.

मस्त विचार 1489

ज़िन्दगी जाने कब से गुनगुना रही है …कुछ कानों में….

ज़िम्मेदारियों के शोर में, ….कुछ सुनाई नहीं देता.

कभी- कभी जल्दबाजी और ज़िम्मेदारियों में _ हम खुद को खो देते हैं और हमें ख़बर भी नहीं होती..

_खैर, खुद को खोकर, फिर खुद को पा लेने की जद्दोजहद का नाम ही ज़िंदगी है..!!

अधिकांश लोग _अपनी ज़िम्मेदारियों, संघर्षों और चिंता में _इतने फँसे हुए हैं कि _किसी और से क्या पूछे कि _वे क्या कर रहे हैं.

मस्त विचार 1488

कभी ख़ुशी की आशा, कभी गम की निराशा,

कभी खुशियों की धूप, कभी हकीकत की छाया,

कुछ खोकर……..पाने की आशा……

शायद यही है, ज़िन्दगी की सही परिभाषा…

मस्त विचार 1487

यादों को भुलाने में कुछ वक़्त तो लगता है, आँखों को सुलाने में कुछ वक़्त तो लगता है….

किसी शख्स को भुला देना इतना आसान तो नहीं होता, दिल को समझने में कुछ वक़्त तो लगता है….

भरी महफ़िल में जब कोई अचानक याद आ जाये तो फिर आँसुओ को छुपाने में कुछ वक़्त तो लगता है….

जो शख्स जान से भी प्यारा हो अचानक दूर हो जाये तो….दिल को यकीं दिलाने में कुछ वक़्त तो लगता है…..

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