सुविचार 4793

वैसे तो खुशी को परिभाषित करना बहुत ही मुश्किल है, लेकिन हमारी खुशी हमारी सोच पर निर्भर करती है.

_ हम शिकायत कर सकते हैं कि गुलाब की झाड़ियों में कांटे होते हैं या खुश हो कर कह सकते है कि कांटों की झाड़ियों में गुलाब होते हैं.

_ हमें हमेशा सुखद और कर वंदनीय लगने वाली सोच के साथ चलते रहना चाहिए.

हम हमेशा एक दूसरे से शिकवे शिकायत करते हैं, ये सोचकर कि सामने वाले को हम अपना मानते हैं और सामने वाला समझता भी है,

_ फिर धीरे धीरे वो शिकवे शिकायत होने कम होते चले जाते हैं और वो एक दूसरे के दूर भी होने शुरू हो जाते,
_ इस बात का एहसास तब नहीं होता, उस वक्त जरूर होता है जब हम किसी को खो चुके होते हैं
_ फिर उस वक्त एहसास होता है कि वो शिकायतें तो सही थी, बस हम ही खुद को न बदल पाए और न सामने वाले को समझ पाए।
_ जब इंसान व्यस्त होता है तो बहुत सी चीजों को इग्नोर करता है तो बहुत सी चीजों से दूर भागता है,
_ लेकिन जब वो अकेला होता है बिल्कुल समुद्र के शांत जल की तरह तो उसके अंदर एक उथल पुथल आ जरूर होता है ज्वालामुखी की तरह, जो उसके अंदर उबल रहा होता है।
_ बस अफसोस उस वक्त हालात ऐसे हो जाते हैं कि सुनने वाला ही कोई नहीं होता…
_ बस यही जिंदगी है, हर किसी को एक दूसरे से शिकायतें हैं, कोई कहने वाला है तो कोई चुपचाप सुनने वाला।
_ बस एक दूसरे को समझने वाले कम हो गए हैं….
— हेसाम
अपने रास्ते में आने वाले कांटे खुद हटाने पड़ते हैं.

_ काश कि कोई काँटे हटाने वाला भी होता.
_अब तो काँटे बिछाने वाले मिल जाते हैं, लेकिन हटाने वाला इक्का दुक्का ही है.!!
– Tejbeer Singh Sadher

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