मस्त विचार 1429
मंदिर में फूल चढ़ा कर आया तो यह एहसास हुआ कि…
पत्थरों को मनाने….फूलों का क़त्ल कर आया हूँ…
गया था” गुनाहों की माफ़ी मांगने…
वहाँ एक और गुनाह कर आया हूँ.
पत्थरों को मनाने….फूलों का क़त्ल कर आया हूँ…
गया था” गुनाहों की माफ़ी मांगने…
वहाँ एक और गुनाह कर आया हूँ.
जो दर्द बर्दाश्त करना जानता हो.
वक्त तो तुम्हारे मजे लेता ही रहेगा.
जिसे हम बिना कुछ किये हरगिज़ नहीं पा सकते !!
गिराने वाले एक रोज नहीं, हर रोज मिला करते हैं..
जिद तो उसकी है जो मुकद्दर में लिखा ही नहीं.