मस्त विचार 1634
रात की मुट्ठी में सवेरा भी है,
शर्त है कि पहले जी भर के अँधेरा तो देख.
शर्त है कि पहले जी भर के अँधेरा तो देख.
काश कोई तो मेरी नजर से भी देखता मुझको.
“कौन” हाथ छुड़ा कर भागता है..और “कौन” हाथ पकड़ कर…
बार बार मरकर देखा तो, जीना सीख गए.
ठोकर खाते रहे, चलते रहे फिर भी हम.
इसी तरह इक दिन हम संभलना सीख गए.
ज़िन्दगी छोटी लगी, और सपने बड़े बड़े.
तन से हारे नहीं, मन से लड़ना सीख गए.
दुख सुख गम ख़ुशी, सबसे एकाकार हुए.
गम को छुपाना और दर्द में मुस्कुराना सीख गए.
सच तो ये है कि वहाँ भी तुम थे…..
नए मौसम का पता बता, जो गुजर गया, वो गुजर गया.