मस्त विचार 1276
बुझ जाए तो शमां तो जल सकती है,
कश्ती हदे तूफां से निकल सकती है,
मायूस न हो, इरादे न बदल.
तकदीर किसी भी वक़्त बदल सकती है.
कश्ती हदे तूफां से निकल सकती है,
मायूस न हो, इरादे न बदल.
तकदीर किसी भी वक़्त बदल सकती है.
आपस के प्रेम के स्त्रोत उतने ही अधिक होंगे.
अगर ‘वक़्त’ हमारा ‘अच्छा’ हो !
उस उम्र की बातें, उम्र भर याद आती है.
वर्ना जिंदगी कट जाती हे… “तक़दीर” को इल्जाम देते देते…
उसका परिणाम कभी छोटा नहीं होता.