मस्त विचार 700
पर चुप इसलिये हूँ कि जो दिया तू ने वो भी बहुतों को नसीब भी नही होता.
पर चुप इसलिये हूँ कि जो दिया तू ने वो भी बहुतों को नसीब भी नही होता.
गीत तेरा हर वक़्त गाने लगा हूँ, तू मिल गया है सारा आलम महका, झूमते झूमते खुद पे इतराने लगा हूँ,
और दूसरों पर रखो तो कमजोरी बन जाती है…
कुछ लोग बेगाने लुट गए.. कुछ अपनो ने बदनाम किया, कुछ बन अफसाने छूट गए .. कुछ अपनी शिकस्ता नाव थी, कुछ हम से किनारे छुट गए ..!
तसल्ली हैं कि अभी तक शक्ल की पहचान बाकी हैं…!
चलने मे माहीर बन जाऊँगा. …..या तो मंजिल मिल जायेगी ….या मूसाफिर बन जाऊँगा.