मस्त विचार 670

एक कुम्हार माटी से चिलम बनाने जा रहा था।

उसने चिलम को आकार दिया।

थोड़ी देर में उसने चिलम को बिगाड़ दिया l

माटी ने पूछा – अरे कुम्हार, तुमने चिलम अच्छी

बनाई फिर

बिगाड़ क्यों दिया.?

कुम्हार ने कहा कि- अरी माटी, पहले मैं चिलम

बनाने की

सोच रहा था, किन्तु मेरी मति (दिमाग) बदली

और अब मैं सुराही या फिर घड़ा बनाऊंगा।

. ये सुनकर माटी बोली- रे कुम्हार, तेरी तो मति

बदली, मेरी तो जिंदगी ही बदल गयी…l

चिलम बनती तो स्वयं भी जलती और दूसरों को

भी

जलाती…. अब सुराही बनूँगी तो स्वयं भी

शीतल रहूँगी …

और दूसरों को भी शीतल रखूंगी…

“यदि जीवन में हम सभी सही फैसला लें… तो हम

स्वयं भी

खुश रहेंगे.. एवं दूसरों को भी खुशियाँ दे सकेंगे.

मस्त विचार 669

जब होता हूँ अकेला, लफ्जों की महफ़िल सजाता हूँ.

तेरे मेरे एहसास घोल कर एक नई गजल बनता हूँ.

मस्त विचार 668

इन्सान मकान बदलता है, वस्त्र बदलता है, सम्बन्ध बदलता है, फिर भी दुःखी रहता है-

क्यूँकि वह अपना स्वभाव नहीं बदलता.

मस्त विचार 667

बनावटी लोगों से संभल कर रहना,

पहले रो- रोकर आपके दुःख दर्द पूछेंगे,

फिर हंस हंस के जमाने वालों को बताएंगे.

मस्त विचार 666

ज़िंदगी में जब मुसीबत आये, तब सम्भव हो तो किसी से मदद मत मांगना.

क्योंकि मुसीबत चार दिन की और एहसान ज़िंदगी भर का.

मस्त विचार 665

दुनिया में कोई भी व्यक्ति अशान्त रहना नहीं चाहता,

मगर फिर भी अशान्ति वाले कार्य करने से बाज नहीं आता.

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