मस्त विचार 686

ये चन्द पंक्तियाँ जिसने भी लिखी है,

खूब लिखी है

ग़लतियों से जुदा तू भी नही,

मैं भी नही,

दोनो इंसान हैं, खुदा तू भी नही,

मैं भी नही ..

” तू मुझे ओर मैं तुझे इल्ज़ाम देते हैं मगर,

अपने अंदर झाँकता तू भी नही,

मैं भी नही ” ..

” ग़लत फ़हमियों ने कर दी दोनो मैं पैदा दूरियाँ,

वरना फितरत का बुरा तू भी नही, मैं भी नही.

इंसान की फितरत है _ जो छोड़ कर जाए _ उसके लिए तड़पता है ;

और जो अपना सब छोड़ कर आए, _ उसे तवज्जों नही देता !

सारा दोष बस ऐसी फितरत का ही है !

मस्त विचार 682

सदा उन के कर्जदार रहिये जो आप के लिए

कभी खुद का वक्त नहीं देखता है,

और

सदा उन से वफ़ादार रहिये जो व्यस्त होने के

बावजूद भी आप के लिए वक़्त निकालता है.

मस्त विचार 681

इस दुनियाँ के हर शख्स को नफरत है “झूठ” से…

मैं परेशान हूँ ये सोच कर, कि फिर ये “झूठ” बोलता कौन है”.

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