मस्त विचार 696
तसल्ली हैं कि अभी तक शक्ल की पहचान बाकी हैं…!
क्या हुआ अगर देख कर मूंह फेर लेते हैं वो…
तसल्ली हैं कि अभी तक शक्ल की पहचान बाकी हैं…!
क्या हुआ अगर देख कर मूंह फेर लेते हैं वो…
चलने मे माहीर बन जाऊँगा. …..या तो मंजिल मिल जायेगी ….या मूसाफिर बन जाऊँगा.
चलता रहूँगा मै पथ पर
वरना जीत की क्या औकात,जो हमें ठुकरा दे….
वो मंजिल ही बदनसीब थी, जो हम पा न सके….
सुख ही सुख दुँगी तुम्हे ….ये कह कर मुकर गई जिन्दगी.
_ लेकिन काम से मिली पहचान जिन्दगी भर रहती है.