मस्त विचार 559
नेकी तेरी कहीं तुला पर तुले ना तुले,
मांग ले अपनी गलतियो की माफी खुद से,
क्या पता आँख कल ये खुले ना खुले ?
नेकी तेरी कहीं तुला पर तुले ना तुले,
मांग ले अपनी गलतियो की माफी खुद से,
क्या पता आँख कल ये खुले ना खुले ?
सोचू तो बिखर जाऊँ ना सोचू तो किधर जाऊँ…..
…क्योंकि मै जिस माहौल में रहता हूँ उसे दुनिया कहते हैं.
परन्तु इस बात को सुनिश्चित करें कि अन्त में फैसला आपका ही होना चाहिए.
हम ने पलकों को बिछाया है.
याद में तेरी आंसू को बहाया है.
हमें मालूम है आदत तेरी
हौले से
हमारी ओर कदम बढ़ाते हो,
ज्ञान की मस्ती बरसाते हो
चले जाते हो.
तेरे क़दमों की चाप को,हम महसूस करते हैं.
ऎसा सजाया है तुम को इस बार
आ गए हो एक बार
तो फिर
जाने ही तुम को नहीं देंगे.
लगता है डर फ़रेब-ए-वफ़ा से कभी कभी-
ऐसा न हो कि ज़ख्म कोई फिर नया मिले-
अब तक तो जो भी दोस्त मिले बेवफ़ा मिले.