मस्त विचार 465
हर रात जान-बूझ कर रखता हूँ दर खुला..
कोई तो हो लूटेरा जो मेरे गम भी लूट ले…
कोई तो हो लूटेरा जो मेरे गम भी लूट ले…
वीरानों में भटकना ही मेरी ज़िन्दगी है,
लगता है जैसे किसी को मेरी जरुरत नहीं,
मंज़िलें तो बहुत है पर कोई साथ नहीं.
महीनों तपती जमीन और कांटों से _ बचाया था जिसने…
मेरा वजूद जैसे किनारा नदी का था…….
गुलशन में हमीं, लेकिन खुशबू को तरसते है…….
_ और दुख का कोई खरीदार नहीं होता !!