मस्त विचार 312
अजीब दास्ताँ है ये, कहा शुरू कहा खत्म
ये मंजिल है काैन सी, न वाे समझ सके न हम.?
ये मंजिल है काैन सी, न वाे समझ सके न हम.?
तुझको देखा तो छलके नयन हैं, ऐ यार है तुझको नमन है.
तू बुलाता रहे और मैं आता रहूँ.
ज़िन्दा हूँ सच बोल के भी ; देख के ख़ुद हैरान हूँ मैं
इतनी मुश्किल दुनिया में ; क्यूँ इतना आसान हूँ मैं
चेहरों के इस जंगल में ; खोई हुई पहचान हूँ मैं
खूब हूँ वाकिफ़ दुनिया से ; बस खुद से अनजान हूँ मैं
हालात मेरे मुझे लाचार करते हैं,
आँखें मेरी पढ़ लो कभी,
मै खुद कैसे कहूँ कि,
तुम मुझे याद बहोत आते हो.
आज तो उसको महफ़िल में बुला लो यारों.
मेरे मोबाइल पर उसका मैसेज तो पढ़ो यारों.
जिसमे आने का वादा किया था उसने.