मस्त विचार 315
डूबे हुए को हमने बिठाया था अपनी कश्ती में यारों और,
फिर कश्ती का बोझ कहकर, हमें ही उतार दिया.
फिर कश्ती का बोझ कहकर, हमें ही उतार दिया.
तेरा हँसता चेहरा उदास क्यूँ है.
तेरी आँखों में प्यास क्यूँ है.
जिस के पास तेरे लिए वक़्त नहीं
वही तेरे लिए ख़ास क्यूँ है.
जो हर मोड़ पे चलना जानता है.
कुछ पा कर तो हर कोई मुस्कुराता है.
ज़िन्दगी उसी की होती है,
जो सब खो कर भी मुस्कुराना जानता है.
ये मंजिल है काैन सी, न वाे समझ सके न हम.?
तुझको देखा तो छलके नयन हैं, ऐ यार है तुझको नमन है.
तू बुलाता रहे और मैं आता रहूँ.