मस्त विचार 309

गीता हूँ कुरआन हूँ मैं ; मुझको पढ़ इंसान हूँ मैं

ज़िन्दा हूँ सच बोल के भी ; देख के ख़ुद हैरान हूँ मैं

इतनी मुश्किल दुनिया में ; क्यूँ इतना आसान हूँ मैं

चेहरों के इस जंगल में ; खोई हुई पहचान हूँ मैं

खूब हूँ वाकिफ़ दुनिया से ; बस खुद से अनजान हूँ मैं

मस्त विचार 308

रह कर दूर तुझ से बेक़रार रहते हैं,

हालात मेरे मुझे लाचार करते हैं,

आँखें मेरी पढ़ लो कभी,

मै खुद कैसे कहूँ कि,

तुम मुझे याद बहोत आते हो.

मस्त विचार 307

मै इन्तजार में बैठा हूँ यार तेरे.

आज तो उसको महफ़िल में बुला लो यारों.

मेरे मोबाइल पर उसका मैसेज तो पढ़ो यारों.

जिसमे आने का वादा किया था उसने.

मस्त विचार 305

ज़िन्दगी मेरे कानों में हौले से कह गई,

उन रिश्तों को थामे रखना, जिनके बिना गुजारा नहीं.

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