मस्त विचार 284

खाने में कोई ‘ज़हर’ घोल दे तो एक बार उसका ‘इलाज’ है.

लेकिन

‘कान’ में कोई ‘ज़हर’ घोल दे तो, उस का कोई ‘इलाज’ नहीं है.

मस्त विचार 283

कभी सोचा न था कि ?

मुस्कुराने की आदत भी कितनी मंहगी पड़ेगी हमको.

छोड़ दिया सब ने ये सोच कर

हम तो अकेले भी खुश रह लेंगे.

मस्त विचार 282

तूने कब सींचा मै हरा हो गया.

तूने कब कर दी ये शीतल छाया.

अब मुझको बस तू ही संभाले.

अब तो जीऊँगा तेरे ज्ञान के सहारे.

मस्त विचार 281

ज़िंदगी

कमरे की दीवार पर

लगे कलैंडर से मिलती जुलती होती है…

जिस पर हर दिन नयी तारीख आती है.

नया हफ्ता आता है. साल बदल जाता है.

ज़िंदगी में भी हर दिन, एक नयी समस्या से

झूझना पड़ता है..

हर हफ्ते सोच बदलती है..

हर साल कोई साथ छोड़ता है.

कोई नया साथ बनता है..

कलैंडर को तो देख कर पता चल जाता है

कल नयी तारीख आयेगी..

पर ‪ज़िंदगी‬ में पता नहीं चल पाता

कल कौन सी ‪समस्या‬ सर उठाएगी…

मस्त विचार 280

हिचकियों से एक बात का पता चलता है कि कोई हमें याद तो करता है,

बात न करे तो क्या हुआ

कोई आज भी हम पर कुछ लम्हें बरबाद तो करता है.

 

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