मस्त विचार 320
दिन गुज़रते हैं मेरे सब्र की दीवार के साथ….
तुम ये दीवार गिराने मत आ जाना……..
तुम ये दीवार गिराने मत आ जाना……..
कैसे- कैसे मेहरबां साथी बना लेता हूँ मैं…….
ज़माने ने समझा हमारा दौर ही ख़त्म हो गया.
आप कब गलत थे………इसे कोई कभी नहीं भूलता.
पसंद के लोग अक्सर बिछड़ते रहते हैं..!…..
फिर कश्ती का बोझ कहकर, हमें ही उतार दिया.