मस्त विचार 235

औरों के लिए जीते थे तो किसी को शिकायत ना थी ,

जरा सा अपने लिए क्या सोचा , जमाना दुश्मन बन गया.

मस्त विचार 231

मैंने तुमको अपना जाना, अपने से भी ज्यादा माना.

पर इतना सब करने पर भी, तुमने क्या मुझको पहचाना.

तुम तो अब भी पहले जैसे, लगते हो वैसे के वैसे.

मै कितना मजबूर हुआ हूँ, अपनों से भी दूर हुआ हूँ.

मस्त विचार 230

किसी के साथ किसी प्रतियोगिता की कोई आवश्यकता नहीं है ; _ आप स्वयं हैं, और जैसे आप हैं, आप पूरी तरह से अच्छे हैं ; खुद को स्वीकार करें.

🟠 आप वो बन जाते हैं जो आपको लगता है कि आप हैं.

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