मस्त विचार 163

छेनी की चोटों से जितना , रेशा – रेशा दुखता है .

ऊँचा उठने की कीमत तो , जख्मी मीनारों से पूछ .

मस्त विचार – अँधेरे में दिया जला दो मेरा – 162

– अँधेरे में दिया जला दो मेरा –

_ अँधेरे में दिया जला दो जरा, मुझे कोई रास्ता सूझता नहीं.
_ जिंदगी पहेली बन गई है मेरी, मगर कोई उसको बुझता नहीं.
_ उठते हुए को पूजते हैं लोग, गिरते को कोई पूछता नहीं.
_ मन में पड़ी जो ऐसी दरार, लाख कोशिश से भी वो जुड़ता नहीं.
_ मोम-सा मन पत्थर बना, जो पिघलाने से भी पिघलता नहीं.
_ मन पर जख्म इतने गहरे हुए, जो मलहम लगाने से सूखते नहीं.
_ बता दो जहाँ में इंसान कोई, जो मुश्किलों से उबारे जरा.
– अँधेरे में दिया जला दो मेरा –
असली बहादुरी अपने भीतर के अंधेरे पर विजय पाने में है.
_ हमारा दायित्व है हम बदलें, पर हम में इतना होश और अक्ल कहां ?
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