मस्त विचार 236

गीत गाता हूँ तुम्हे पाने के लिए,

जीत भी जाता हूँ कभी मैं हार जाने के लिए,

ये जिंदगी ही है ऐसी जिसका कुछ पता नहीं,

दूर जाता हूँ कभी मैं पास आने के लिए,

समझते जो मुझे दुश्मन ये उनकी ही है समझ

मैं तो खड़ा हूँ हर घड़ी सिर झुकाने के लिए,

गीत गाता हूँ तुम्हे पाने के लिए.

मस्त विचार 235

औरों के लिए जीते थे तो किसी को शिकायत ना थी ,

जरा सा अपने लिए क्या सोचा , जमाना दुश्मन बन गया.

मस्त विचार 231

मैंने तुमको अपना जाना, अपने से भी ज्यादा माना.

पर इतना सब करने पर भी, तुमने क्या मुझको पहचाना.

तुम तो अब भी पहले जैसे, लगते हो वैसे के वैसे.

मै कितना मजबूर हुआ हूँ, अपनों से भी दूर हुआ हूँ.

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