मस्त विचार 068

निखरती है मुश्किलों से ही शख्सियत यारों,

जो चट्टानों से ही न उलझे वो झरना किस काम का.

 

मस्त विचार 066

तू चाहे तो फिर खिल जाऊँ.

तू चाहे तो फिर बहार आये.

फिर से तू मुझको खिला दे.

फिर से तू जीवन मस्त बना दे.

मस्त विचार 064

मेरी असलियत से अनजान हैं ज़माने वाले.

सभी राज़ नहीं होते बताने वाले.

कभी पास आकर देखो हमें.

कैसे रोते हैं दूसरों को हंसाने वाले.

रिश्ता बनाया है तो निभाएंगे.

हर पल सबको यों ही हंसाएंगे.

मस्त विचार 063

पलकों पे अपने बैठाया है तुम्हे, बड़ी दुआओं के बाद पाया है तुम्हे.

_ आसानी से नहीं मिले हो तुम, वक़्त काफी लगा कर पाया है तुम्हे.!!

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