मस्त विचार 068
निखरती है मुश्किलों से ही शख्सियत यारों,
जो चट्टानों से ही न उलझे वो झरना किस काम का.
जो चट्टानों से ही न उलझे वो झरना किस काम का.
_ अकल का बोझ उठा नहीं सकता !!
तू चाहे तो फिर बहार आये.
फिर से तू मुझको खिला दे.
फिर से तू जीवन मस्त बना दे.
_ की उदास होने का वक़्त ही ना मिले..
सभी राज़ नहीं होते बताने वाले.
कभी पास आकर देखो हमें.
कैसे रोते हैं दूसरों को हंसाने वाले.
रिश्ता बनाया है तो निभाएंगे.
हर पल सबको यों ही हंसाएंगे.
_ आसानी से नहीं मिले हो तुम, वक़्त काफी लगा कर पाया है तुम्हे.!!