मस्त विचार 468
सोचा था घर बनाकर बैठुंगा सुकून से,
पर घर की जरूरतों ने मुसाफिर बना डाला.
पर घर की जरूरतों ने मुसाफिर बना डाला.
ग़लती वह है जो हमें चुभन देती है,
यह चुभन ही हमारी अन्तरात्मा को कचोटती है
और ग़लती को दोबारा नहीं होने देती.
कोई तो हो लूटेरा जो मेरे गम भी लूट ले…
वीरानों में भटकना ही मेरी ज़िन्दगी है,
लगता है जैसे किसी को मेरी जरुरत नहीं,
मंज़िलें तो बहुत है पर कोई साथ नहीं.
महीनों तपती जमीन और कांटों से _ बचाया था जिसने…