सुविचार 295

जीवन में दुर्बलताओं का स्थान नहीं,

” मन की शक्ति ” जीवन की सारी शक्तियों का स्त्रोत है.

सुविचार 294

हम सभी के लिए जरुरी है कि जिस तरह हम हर सुबह अपना घर साफ़ करते हैं, अपने शरीर को साफ़ करने के लिए नहाते हैं, ठीक उसी तरह अपने दिमाग को भी रोज साफ़ करें. यह बहुत साधारण- सी बात है. अगर आप घर के कूड़ेदान का कचरा दो- तीन दिन नहीं फेंकते, तो पूरे घर में बदबू फ़ैल जाती है. ठीक उसी तरह अगर आप कुछ दिन पहले कि बात को, किसी के द्वारा किए गए अपमान को, बुरे व्यवहार को अपने दिमाग में जमा करते जायेंगे, तो आपका दिमाग भी बदबूदार हो जाएगा, तो आप ढेर सारे बुरे विचार अपने दिमाग में भर कर रखेंगे, तो जीवन की यात्रा आरामदेह नहीं रह जाएगी. आपको लक्ष्य तक पहुँचने में ज्यादा वक़्त लगेगा.

सुविचार 293

उपलब्धियाँ और आलोचनाएँ एक दूसरे की मित्र हैं, उपलब्धियाँ बढ़ेंगी तो निश्चित ही आपकी आलोचनाएँ भी बढ़ेंगी.

सुविचार 291

वाणी ही मनुष्य का ऐसा आभूषण है, जो अन्य आभूषणों की तरह कभी घिसता नहीं.

 

सुविचार – मेकअप – Makeup – 290

मुझे कुण्टल भर मेकअप पसंद नहीं है.

_ जो इंसान की प्राकृतिक सुन्दरता और मेहनत से कमाया धन..
_ दोनो क्षणिक खूबसूरती के लिए छीन लेता है,
_ घर पर हल्का सा मेकअप भी महिला को खूबसूरत बना सकता है.!

सुविचार 288

ज़िन्दगी जीने का नाम है वो भी ख़ुशी से, लेकिन हमें खुद अपने लिए ग़लत और सही का निर्णय करना होगा. 

सुविचार- “कि कोई सुने… कोई जाने…” – 287

आप कितने भी अच्छे क्यों न हो, _ऐसा कभी नहीं होगा कि आपसे सब खुश हों.!!
“कि कोई सुने… कोई जाने…”

_ बहुत-सी बातें थीं मेरे मन में.
_ ऐसी बातें जो कभी किसी से कही नहीं जा सकीं.
_ ऐसा नहीं था कि उन्हें कहने की हिम्मत नहीं थी, बस किसी पर इतना भरोसा नहीं बन पाया कि शब्द अपने आप बाहर आ जाएँ.
_ कई बार लगता था, शायद बिना कहे ही कोई समझ जाएगा.
_ शायद मेरी आँखें, मेरी चुप्पी, मेरी झुकी हुई निगाहें वह सब कह देंगी जो मैं कह नहीं पा रहा.
_ लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं.
_ मेरे भीतर अक्सर एक तूफ़ान उठता था.
_ बाहर से सब सामान्य दिखता, पर भीतर जैसे कुछ लगातार टूटता, बनता और बिखरता रहता.
_ चेहरे पर मुस्कान रहती, बातें भी होतीं, दिन भी गुजरते रहे –
पर जो सबसे ज़्यादा सच था, वही अनकहा रह गया.
_ मैं इंतज़ार करता रहा उस एक क्षण का,
जब कोई मेरी ख़ामोशी को सुन लेगा.
_ जब कोई समझेगा कि हर चुप्पी शांति नहीं होती ;
कुछ चुप्पियाँ अपने भीतर बहुत शोर छुपाए रहती हैं.
_ मन करता था कि कोई ऐसा कंधा मिले, जहाँ सिर रखकर मैं अपने सारे बोझ उतार सकूँ.
_ जहाँ मुझे अपने शब्दों को साबित न करना पड़े.
_ जहाँ समझे जाने के लिए बोलना आवश्यक न हो.
_ लेकिन धीरे-धीरे एक बात समझ आने लगी –
ज़्यादातर लोग सुनते कम हैं,
_ लोग ऊपरी बातों में और अपनी-अपनी कहानियों में अधिक व्यस्त रहते हैं.
_ उन्हें चेहरा दिखाई देता है, पर पढ़ना नहीं आता उसकी दरारों को.
_ तब मन में दुनिया से एक छोटा-सा गिला जन्म लेने लगा.
_ कोई बड़ा आरोप नहीं, बस एक मासूम-सी शिकायत –
_ कि इतने लोगों के बीच भी कोई ऐसा क्यों नहीं मिला, जो सचमुच देख पाता ?
_ फिर एक दिन लगा,
शायद हर भावना का कोई श्रोता होना ज़रूरी नहीं.
_ कुछ बातें कहे जाने के लिए नहीं, समझे जाने के लिए जन्म लेती हैं.
_ और जब उन्हें कोई नहीं समझता, तो वे धीरे-धीरे भीतर की ख़ामोशियों में अपना घर बना लेती हैं.
_ अब भी कभी-कभी मन चाहता है –
कि कोई सुने… कोई जाने…
_ लेकिन अब यह चाह पहले जैसी बेचैन नहीं रही.
_ शायद इसलिए कि समय ने सिखा दिया है –
कुछ रास्ते हमें दूसरों के साथ नहीं, अपने भीतर अकेले तय करने होते हैं.
_ और वहाँ,
जहाँ शब्द साथ छोड़ देते हैं,
ख़ामोशी धीरे से हमारा हाथ थाम लेती है.!!
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