मस्त विचार 216
अपने घर के लोगों में , बग़ावत हो गई.
अपने घर के लोगों में , बग़ावत हो गई.
वैसे संभालना हम भी जानते थे;
ठोकर भी लगी तो उसी पत्थर से;
जिसे हम अपना मानते थे.
क्योंकि संसार के राजा के साथ रहता हूँ,
उस चाँद को बहुत गुरूर है
कि उसके पास नूर है…..
मगर वो क्या जाने की
मेरा तो यार ही कोहिनूर है.
याद तुमने किया ही नहीं था.
बुला के तो देख मै कैसे न आऊँ.
तेरा हूँ मै तेरे पास ही आऊँ.
क्यों हो नाराज यह बयान तो किजीए.
कर दीजीए माफ़ ग़र हो गई हो ख़ता.
यों खामोश रहकर सजा ना दीजीए.
कर्म पथ को रह पूजता, बीच में मत छोड़.
कर कोशिश सपनों को परवान चढाने की.
खुद ही खुद को यूँ मझधार में मत छोड़.
पर मैं बढ़ता गया रास्ता देख कर.
खुद ब खुद मेरे नजदीक आती गई.
मेरी मन्जिल मेरा हौसला देख कर.
और सजा लो कुछ नयी सदभावनाएँ.
कमबख्त जो भी उस से मिलता है, ज़िन्दगी जीना ही छोड़ देता है.