सुविचार – अच्छी बातें – 260

अच्छी बातें पसंद तो लगभग सभी को आती हैं, लेकिन उन्हें सुनना, अपनाना और जीना..

_ यह बहुत कम लोगों को पसंद आता है.
उदाहरण के लिए-
“क्रोध कम करना चाहिए” – सब सहमत हो जाएंगे.
“अहंकार छोड़ना चाहिए” – सब सिर हिला देंगे.
“दूसरों को समझना चाहिए” – सब कहेंगे सही बात है.
_ लेकिन जब वही बात खुद पर लागू करने की बारी आती है, तो मन असहज होने लगता है.
– क्यों ?
_ क्योंकि अच्छी बातें अक्सर हमसे कुछ माँगती हैं- थोड़ा त्याग, थोड़ा धैर्य, थोड़ा आत्मनिरीक्षण और कभी-कभी अपने भ्रम छोड़ने का साहस.
_ मन को वह बातें ज़्यादा पसंद आती हैं जो उसे सही साबित करें, न कि जो उसे बदलने के लिए कहें.
_ इसलिए कई बार एक चुटीला व्यंग्य, एक मसालेदार गपशप, या किसी की आलोचना लोगों को तुरंत आकर्षित कर लेती है.
_ जबकि एक गहरी बात सुनकर वे कहते हैं –
“हाँ, बात तो अच्छी है…” और आगे बढ़ जाते हैं.
– “अच्छी बातें सुनने में सबको अच्छी लगती हैं, लेकिन वे जीवन में जगह तभी पाती हैं, जब हम उनकी कीमत चुकाने को तैयार हों”
_ और शायद एक कारण यह भी है कि-
अच्छी बातें अक्सर हमारे भीतर की कमियों पर रोशनी डालती हैं, और हर कोई उस रोशनी में खड़ा होना नहीं चाहता.
लेकिन मेरा अनुभव यह भी कहता है –
_ बहुत कम लोग अच्छी बातों को तुरंत पसंद करते हैं, पर जीवन धीरे-धीरे सबको उनकी ज़रूरत समझा देता है.
_ कई बार जो बात 25 साल की उम्र में उबाऊ लगती है, वही 45 की उम्र में जीवन का सार लगने लगती है.!!

सुविचार – ख़ूबसूरत – खूबसूरत – 259

जिस से आप मिलें उस पर अपनी छाप छोड़ने का प्रयास करें.
ख़ूबसूरत लोग हमेशा तारीफ़ करना जानते हैं.

_ ख़ुश लोग दूसरों की ख़ुशी में दिल से ख़ुश होते हैं.
_ कई ज़बानें बोलने वाले आपके लहजे का मज़ाक़ नहीं उड़ाते.
_ पढ़े-लिखे लोग अपना इल्म बाँटते हैं.
_ और आत्मविश्वासी लोग दूसरों को आगे बढ़ने की हौसला-अफ़ज़ाई करते हैं.
लेकिन…
_ जो लोग अंदर से ख़ाली होते हैं,
_ जिनकी अपनी कोई शख़्सियत नहीं होती
_ वही अक्सर दूसरों को नीचा दिखाने,
_ तकलीफ़ पहुँचाने, बदनाम करने
_ और ज़लील करने में अपनी “बड़ाई” तलाशते हैं.
– जिसके अंदर रोशनी होती है,
वह दूसरों के चराग़ बुझाने की कोशिश नहीं करता.!!

सुविचार – किसी के अंदर इतना भी मत झांको कि अपनी नाक को कपड़े से ढकना पड़े. – 258

किसी के अंदर इतना भी मत झांको कि अपनी नाक को कपड़े से ढकना पड़े.

_ कभी-कभी हम जिज्ञासा या लगाव में दूसरों के भीतर इतना झांकने लगते हैं कि उनके छिपे हुए अंधेरे, कमज़ोरियाँ या असलियत हमें असहज करने लगती है.
_ तब हमें खुद को बचाने के लिए “नाक ढकनी” पड़ती है—यानी दूरी बनानी पड़ती है.
_ हर इंसान के भीतर कुछ सुंदर होता है और कुछ बोझिल भी..
_ हमें इतना ही देखना चाहिए जितना हमारे लिए आवश्यक और स्वस्थ हो.
_ क्योंकि दूसरों की गहराइयों में उलझकर हम अपनी रोशनी को धुंधला नहीं कर सकते.
_ असली संतुलन यही है: जानकारी और दूरी, अपनापन और सीमाएँ—इनके बीच सही रेखा खींचना.!!

मस्त विचार 307

मै इन्तजार में बैठा हूँ यार तेरे.

आज तो उसको महफ़िल में बुला लो यारों.

मेरे मोबाइल पर उसका मैसेज तो पढ़ो यारों.

जिसमे आने का वादा किया था उसने.

मस्त विचार 305

ज़िन्दगी मेरे कानों में हौले से कह गई,

उन रिश्तों को थामे रखना, जिनके बिना गुजारा नहीं.

मस्त विचार 302

ठोकरे खाकर भी ना सँभले तो मुसाफिर का नसीब..

वरना..

पत्थर तो अपना फर्ज निभा दिया ही करते हैँ…

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