मस्त विचार 182
जो निभा दे वो फ़रिश्ता है.
जो निभा दे वो फ़रिश्ता है.
हर वक़्त तेरी याद मेरे साथ है.
मन तो करता है कि खुद से ही खुद को चुरा लूँ.
पर कहते हैं चोरी करना बुरी बात है.
यह कभी ठंडी लगे, तो यह कभी गर्म लगे .
तुम अगर बैठ भी जाओ, नजदीक में आकर .
सच में कहूं, सारी दुनिया ही मस्त लगे .
क्या तू सच में जीता .
अच्छा होता कि तू हार जाता .
तू तो जीत कर भी हारा ही है .
दुनिया में जो जीता वह भी हारा .
जो हारा वह तो हारा ही .
तूने क्या पाया ?
क्या करेगा इस जीत का .
किसको दिखायेगा , बताएगा.
खुशियाँ क्या मना पायेगा तू .
केवल बचा है तू और बना है सन्नाटे का बादसाह .
अपनी जीत के साथ अकेला खड़ा है .
तू जीता नहीं , हारा है .
तुझे क्या मिला ?
कोई ना जाने, कोई ना जाने.
आप को हर “वक्त”* पता होता है, आप के पास कितनी “दौलत” है,
लेकिन
आप कितनी भी *”दौलत” खर्च कर के यह नही जान सकते
आप के पास कितना ”वक्त” है !!
…..एक दिन उनके पीछे पूरा काफिला चलता है.
जीवन ख़त्म हो जाए इससे पहले .
सबके लिए कुछ कर जांऊ .
कर्ज है मुझ पर जीवन में .
सफ़र के साथियों का .
काश कुछ मेरे वश में होता .
उतार देता हर एक का क़र्ज़ .
मुझे थोड़ी हिम्मत मिले .
थोडा – सा सफ़र और तय करना है .
दुःख भीतर – भीतर रहता है, मन हर समय कुछ कहता है.
कुछ बात थी जो ख़त्म हो रही है, यादें हैं और विलाप है.
क्या होना था क्या हो गया, मन हर समय ही रो दिया.
कुछ कहने को भी तरशा, हाँ पर बात किससे करूँ.
क्या हुआ कोई भी नहीं कहता,आंसू का दरिया बहता रहता है.
कब से मैं नकाबों की तहे खोल रहा हूँ……..